स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत का स्लोगन कितना प्रभाव डाल रहा है, इसका जीता जागता उदाहरण राजकीय प्राथमिक विद्यालय चंद्रेश्वरनगर है। यहां करीब 150 नौनिहालों को गंदगी के बीच ही संस्कारों की शिक्षा दी जा रही है। क्षेत्र में एकमात्र प्राथमिक विद्यालय होने के कारण परिजनों की मजबूरी है कि वह अपने बच्चों को इसी स्कूल में डालना पड़ रहा है।
दरअसल विद्यालय की चारदीवारी से लगते ही खाली भूमि पड़ी है। इसमें आसपास के लोग अक्सर कूड़ा कचरा डाल देते हैं। इसके अलावा लोगों के घरों का पानी भी नालियों के माध्यम से इस खाली भूमि पर एकत्रित हो जाता है। इस कूड़े कचरे में अक्सर आवारा जानवरों का जमावड़ा लगा रहता है। इससे गर्मियों के मौसम में पूरा क्षेत्र बदबू फैल जाती है।
बरसात के दिनों में समस्या और भी विकराल हो जाती है। यहां थोड़ी सी बरसात में भी विद्यालय के कमरों में पानी भर जाता है। ऐसी स्थिति में विद्यालय बंद करने को मजबूर होना पड़ता है। इन दिनों जलभराव और गंदगी के कारण डेंगू का भी खतरा बना हुआ है। तमाम शिकायतों के बावजूद भी शासन-प्रशासन इस विद्यालय की सुध नहीं ले रहा है। यहां अध्ययनरत छात्रों का कहना है कि अधिक बारिश होने पर यहां जलभराव हो जाता है। जिस कारण उनकी छुट्टी कर दी जाती है। जिससे उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। साथ ही जलभराव और गंदगी के कारण उनके स्वास्थ्य पर भी प्रतिकुल प्रभाव पड़ रहा है।
विद्यालय के कमरों में बैठना एक प्रकार से सजा भुगतने के बराबर है। शिक्षक व छात्र-छात्राएं बदबू व जलभराव की स्थिति से अजिज आ चुके हैं। शिक्षा विभाग से लेकर जिलाधिकारी तक लिखित व मौखिक रूप से शिकायत कर चुके हैं। लेकिन समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
- मुसाहिद हुसैन, प्रधानाध्यापक राप्रावि, चंद्रेश्वरनगर
कक्षा पांच के छात्र अंकित ने बताया कि जैसी ही तेज हवा चलती है विद्यालय के कमरों बदबू आना शुरू हो जाती है। इससे बच्चों की तबियत भी खराब होती रहती है। पढ़ाई में व्यवधान पैदा होता रहता है। ऐसे हालात में पढ़ाई का मन नहीं करता है। खंड शिक्षा अधिकारी अनिता चौहान का कहना है कि चंद्रेश्वनगर में मौजूद विद्यालय गहराई में होने के कारण जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है। विद्यालय के निर्माण के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। शासन से बजट अवमुक्त होते तमाम समस्याओं का निस्तारण किया जाएगा।