उत्तराखंड में कांग्रेस को दोबारा सत्तासीन करने की जिम्मेदारी पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) को मिलने जा रही है।
उत्तराखंड की सत्ता हथियाने को अब कांग्रेस चलेगी 'PK' का पत्ता
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टिकट बंटवारे से लेकर क्षेत्रवाद और जातिवाद समेत अन्य मुद्दों के अलावा चुनाव की रणनीति तय करना उनका प्रमुख एजेंडा होगा। बागियों के रूप में पार्टी छोड़कर गए कई बड़े नामों की कमी पूरी करने के साथ-साथ संगठन और सरकार के बीच मौजूद दरार भरना पीके के सामने दोहरी चुनौती के रूप में सामने आएगा।
उत्तर प्रदेश के मुकाबले उत्तराखंड के चुनावी समीकरण बहुत उलझे हुए नहीं हैं। यहां मुख्य तौर पर कुमाऊं-गढ़वाल और ब्राह्मण-ठाकुर वोटों का गणित है। इन्हीं दो मोर्चों पर सफलता उत्तराखंड की सत्ता का सीधा रास्ता बनाती है।
कांग्रेस में साफ तौर पर अंदरखाने की रार नजर आती है। आए दिन दोनों पक्षों में मोर्चा खुला रहता है। आलाकमान के स्तर से भी इसे निपटाने के तमाम प्रयास भी विफल हो चुके हैं।
गढ़वाल क्षेत्र भी हरीश रावत सरकार में उपेक्षा का शिकार माना जाता है। बीते दिनों मंत्रिमंडल विस्तार में गढ़वाल को तरजीह देकर कुछ हद तक स्थिति बेहतर करने का प्रयास भी किया गया है। इन दोनों अहम बिंदुओं पर प्रशांत किशोर को अपनी काबिलियत दिखानी होगी। इसके अलावा प्रदेश प्रभारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।