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महाशिवरात्रि 2018: इन 10 मंदिरों में विराजते हैं देवों के देव महादेव, देंगे मुंह मांगा वरदान

Tue, 13 Feb 2018 07:49 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 13 Feb 2018 07:49 AM IST
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mahashivratri 2018 most mysterious temple of lord shiva
tungnath

महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पहले अमर उजाला आपको ऐसे 10 मंदिरों के बारे में बताने जा रहा है। जहां महादेव साक्षात विराजते हैं। यहां पूजना और ध्यान करने से वरदान प्राप्त होता है।


 

mahashivratri 2018 most mysterious temple of lord shiva
kedarnath
केदारनाथ धाम: कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां तपस्या की और उसके बाद यही समाधि ली। हिंदू मान्यताओं में केदारनाथ धाम ऊर्जा का बहुत बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां पशुपतिनाथ का पिछला हिस्सा विराजमान है। कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध जीतने पर परिवार के लोगों की हत्या से मुक्ति के लिए पांडवों ने शिव आराधना की, लेकिन भोलेनाथ पांडवों को आशीर्वाद नहीं देना चाहते थे। पांडव यहां पहुंचे तो भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने इनके पैर पकड़ने चाहे तो बैल रूप में शिव अंतर्ध्यान हो गए। तभी से नेपाल के पशुपतिनाथ में बैल के सिर और केदारनाथ में पृष्ठ भाग की पूजा होती है। इस मंदिर का दसवीं सदी में जीर्णोद्धार कराया गया। सदियों से आस्था और विश्वास के इस धाम में भक्ति की अलख यूं ही जगमगा रही है।

 
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Vishwanath Temple
विश्वनाथ मंदिर : विश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है तथा बस स्टैंड के पास ही स्थित है।यह मंदिर हिंदूओं के देव शिव को समर्पित है, तथा भक्त यहां मंत्रों का सस्वर पाठ हर समय सुन सकते हैं। यह मंदिर राजा ज्ञानेश्वर द्वारा बनाया गया था, जबकि भगवान शिव का त्रिशूल गूह द्वारा बनवाया गया था। इस त्रिशूल की लम्बाई 8 फुट और 9 इंच तथा इसकी ऊंचाई लगभग 26 फुट है। एक अन्य लोकप्रिय धार्मिक स्थल, शक्ति मंदिर (को समर्पित हिंदू देवी सती), विश्वनाथ मंदिर के सामने स्थित है।

 
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jageshwar dham
जागेश्वर धाम : देवभूमि उत्तराखंड के इस ऐतिहासिक और प्राचीनतम मंदिर से दुनिया में शिवलिंग के पूजन की शुरुआत हुई।  अल्मोडा जिले के मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर देवदार के वृक्षों के घने जंगलों के बीच पहाडी पर स्थित जागेश्वर महादेव के मंदिर परिसर में पार्वती, हनुमान, मृत्युंजय महादेव, भैरव, केदारनाथ, दुर्गा सहित कुल 124 मंदिर स्थित हैं जिनमें पूजा होती है।भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बताया है। इसके लिए मंदिर परिसर में घोषणा करता एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। एक सचाई यह भी है कि इसी मंदिर से ही भगवान शिव की लिंग पूजा के रूप में शुरूआत हुई थी। यहां की पूजा के बाद ही पूरी दुनियां में शिवलिंग की पूजा की जाने लगी और कई स्वयं निर्मित शिवलिंगों को बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाने लगा। इसका जिक्र शिवपुराण के मानस खण्ड में हुआ है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान यहां की यात्रा की थी और उसने इस मंदिर की प्राचीनता के बारे में जिक्र भी किया है। बताया गया कि जागेश्वर को ही नागेश्वर माना जाता है क्योंकि इस मंदिर के आसपास के अधिकांश इलाकों का नाम नाग पर ही आधारित हैं।

 
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Tadkeshwar mahadev mandir
ताड़केश्वर धाम : गढ़वाल के प्राचीन शिवमदिरों में ताड़केश्चर महादेव का अति महत्व है। पौड़ी जनपद के जयहरीखाल विकासखण्ड के अन्तर्गत लैन्सडौन डेरियाखाल - रिखणीखाल मार्ग पर स्थित चखुलाखाल नामक गांव से लगभग 4 किमी० की दूरी पर समुद्रतल से लगभग 6000 फीट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृखंलाओं के मध्य एक अत्यन्त रमणीक, शांत एवं पवित्र स्थान पर अवस्थित है। सघन गगनचुम्बी पवित्र देवदार के 5 किमी० फैले जंगल के मध्य में स्थित यह ताड़केश्वर धाम अध्यात्मिक चेतना, धर्मपरायणता व सहिष्णुता का उत्कृष्ट आस्था केन्द्र है। महाकवि कालिदास ने अपनी रचना रघुवंश खण्डकाव्य के द्वितीय चरण में श्री ताड़केश्वर धाम का बड़ा मनमोहक वर्णन किया है। हिन्दू धर्मग्रन्थ रामायण में ताड़केश्वर धाम का वर्णन एक दिव्य एवमं पावन आश्रम के रूप में किया है। कहा जात है कि ताड़कासुर का वध करने के बाद भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था, विश्राम के समय उन्हें सूर्य की किरणों की गर्मी से बचाने के लिये मां पार्वती ने देवदार के सात वृक्ष लगाये थे। आज भी ये सातों वृक्ष मन्दिर के अहाते में हैं।

 
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