कांग्रेस के इस कद्दावर नेता की चमकदार राजनीतिक यात्रा का हर कोई कायल है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. एनडी तिवारी के राजनीतिक जीवन में लखनऊ का अहम योगदान किसी से छिपा नहीं है, मगर 1991 में लखनऊ पहुंचना एनडी को शायद सबसे ज्यादा बुरा लगा होगा। वह विधानसभा की जगह यदि लोकसभा का चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे होते, तो प्रधानमंत्री बन सकते थे।
वर्ष 1991 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे। तिवारी विधायक तो बन गए, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार न बनने के कारण वह पांच वर्ष सिर्फ बतौर विधायक ही काम करते रहे। इसी तरह, केंद्र में कांग्रेस की सरकार तो बनी, लेकिन एनडी लोकसभा तक नहीं पहुंच पाए और प्रधानमंत्री की दौड़ में पिछड़ गए। माना जाता है कि दिल्ली में उनकी गैरमौजूदगी का बड़ा फायदा पीवी नरसिम्हा राव को मिला।
वर्ष 1991 में रामलहर ने देश के साथ ही उत्तराखंड में भी चुनावी नतीजों में काफी उलटफेर किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एनडी तिवारी ने दोनों जगह चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। वह नैनीताल बहेड़ी लोकसभा और हल्द्वानी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार बतौर चुनाव मैदान में उतरे।
दोनों चुनाव लड़ने के पीछे तिवारी की दूरदर्शी राजनीतिक सोच थी। इस सोच में केंद्र और उत्तर प्रदेश की आने वाली राजनीति पर निगाहें भी थीं। यानी जहां जैसे समीकरण बने, तिवारी प्रभावशाली भूमिका निभाने के लिए तैयार थे, मगर मतदाताओं के मन की थाह नहीं ले पाए।
चुनाव के नतीजे निकले तो नैनीताल बहेड़ी लोकसभा सीट पर भाजपा के बलराज पासी जैसे अपेक्षाकृत कम अनुभवी नेता ने राजनीति के दिग्गज एनडी तिवारी को परास्त कर दिया था। इसके विपरीत, हल्द्वानी सीट पर तिवारी ने भाजपा के उम्मीदवार तिलकराज बेहड़ को हरा दिया था। तिवारी की हार कई मायनों में झटका मानी गई। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता मथुरादत्त जोशी का कहना है कि तिवारी जी क्या, कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता को सपने में भी यह उम्मीद नहीं थी कि वह हार सकते हैं। हम मानकर चल रहे थे कि तिवारी जी दोनों जगह चुनाव जीतेंगे। मगर यह उत्तराखंड का दुर्भाग्य रहा कि तिवारी जी दिल्ली नहीं पहुंच पाए।