नागा साधु का नाम सुनते ही मन में उनकी एक ही तस्वीर सामने आती है। जिसमें तन पर भस्म लगाए, मस्त मलंग हर समय जप-तप में लीन रहने वाले साधुओं का ही ध्यान आता है। इन सबसे इतर भी उनकी एक दुनिया है। जो नजर नहीं आती है। यह है उनके अंदर छिपा हुआ एक कलाकार। अपनी इस प्रतिभा को वह बहुत ही संजोकर रखते हैं। श्री निरंजनी अखाड़े की छावनी में गुजरात से आए नागा साधु लक्ष्मण गिरि भगवान की भक्ति में लीन होने के साथ ही अपनी कलाकारी भी दिखाते हैं। इनका शिविर अखाड़े की छावनी में लगा हुआ है। शिविर के बाहर उन्होंने अपने आराध्य भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में स्थापित किया है। यह शिवलिंग पत्थर या पारद के नहीं है। शिवलिंग को मिट्टी से बनाया गया है। इसके साथ ही भगवान शिव के वाहन नंदी और कछुआ की प्रतिमा मिट्टी से बनाई है। उन्होंने बताया कि कुंभ मेले में वह जहां भी जाते हैं मिट्टी के शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करते हैं। नागा साधु लक्ष्मण गिरि ने बताया कि वह 108 शिवलिंग का निर्माण भी छावनी परिसर में अपने अखाड़े के सामने करेंगे। जिनकी रोजाना आरती व पूजन होगा। इसके साथ ही इन शिवलिंग को मेला समाप्त होने के बाद गंगा में विसर्जित किया जाएगा।
हरिद्वार कुंभ 2021ः मस्त मलंग ही नहीं, कलाकार भी हैं महाकुंभ में आए नागा साधु, तस्वीरें
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लक्ष्मण दास ने बताया कि शिवलिंग का रोज अलग-अलग श्रृंगार किया जाता है। कहीं उन्हें उज्जैन वाले महाकाल का स्वरूप दिया जाता है तो कभी काशी विश्वनाथ का। उन्होंने बताया कि करीब 500 रुपये के फूलों से रोजाना शिवलिंग की वेदी को सजाया जाता है।
वहीं कुंभ मेले प्राचीन संस्कृति से जुड़ी अनेक रवायतों और परंपराओं की खान है। होली पर नागा संन्यासियों द्वारा कराए जाने वाला गोला पूजन अखाड़ों की मढ़ियों की आय बढ़ाता है। यह परंपरा नागाओं के सातों अखाड़ों में है। उदासीन अखाड़ों के कुछ बाबा भी गोले पुजवाते हैं। होली नजदीक है और हरिद्वार कुंभ में इन दिनों गोला पूजन की तैयारियां की जा रही हैं। वैसे हर वर्ष होली-दिवाली पर संन्यासी गोला पूजन कराते हैं, लेकिन कुंभ मेले की तो बात ही निराली है। कुंभ की प्रतीक्षा नागाओं को खूब रहती है।
अमृत योग का लाभ उठाने के लिए साधु संन्यासी अखाड़ा प्रवेश के बाद धूने सजाकर बैठे हैं। होली पर धूनों की राख से छोटे बड़े गोले बनाए जाते हैं। गोलों का आकार भी सातों अखाड़ों में अलग-अलग हैं। किसी अखाड़े में गोल, किसी में तिकोने, किसी में आयताकार तो किसी में लंबोदर गोले बनाए जाते हैं। धूने भगवान महारुद्र को समर्पित हैं। अत: गोले बड़े पवित्र भाव से तैयार होते हैं। गोलों को लेकर नागा संन्यासी अपने मठाधीशों और पीठाधीश्वरों के पास जाते हैं।
अखाड़े के जिन महात्माओं ने आश्रम बनाए हैं, वहां भी गोला पूजन आयोजन होता है। गोले लेकर आए नागाओं का आश्रमों एवं मठों में खूब सत्कार होता है। गोला पूजन के बाद में उन्हें भोजन कराकर उचित दक्षिणा दी जाती है। आश्रमों से अखाड़ों के लिए राशन भिजवाने की भी परंपरा है, ताकि कुंभ पर आए बाबाओं के भंडार भरे रहें। होली के अवसर पर शुरू होने वाले गोला पूजन काफी समय बाद तक चलते रहते हैं। इस परम्परा के जानकार श्रद्धालु भी अपने परिवार के शुभ के लिए अखाड़ा छावनी के धूना क्षेत्र में आकर गोला पूजन करते हैं। नागा अखाड़ों में गोला पूजन और गोबरी होली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।