चार दिन और तीन राते। भूख प्यार से बेहाल चार दोस्त। केदारनाथ-वासुकीताल-त्रियुगीनारायण ट्रेक निकले और फिर रास्ता भटके चार दोस्तों ने सकुशल लौटने के बाद अपना हाल बताया। दो बिस्कुट के पैकेट लेकर चारों दोस्त वासुकीताल के लिए निकले थे, लेकिन दोपहर को वासुकीताल पहुंचते ही घने कोहरे में भटक गए। बर्फ और घने कोहरे के साथ ही भूख प्यास से बेहाल चारों को जब समझ आया कि अब उनके लिए बाहर निकलना मुश्किल है, तो चारों ने एक दूसरे को संयम और हौसला रखने को कहा। इस बीच तोषी और त्रियुगीनारायण के नौ युवा रास्ता भटके चारों दोस्तों की उम्मीद बनें।
केदारनाथ-वासुकीताल-त्रियुगीनारायण ट्रेक पर रास्ता भटक गए चार दोस्त के लिए वो चार दिन और तीन रातें कभी न भूलने वाली हैं। बतौर ट्रेकर जितेंद्र सिंह भंडारी उर्फ हर्षों और जगदीश बिष्ट ने ट्रेकिंग के दौरान भटकते हुए हम बस यही सोच रहे थे कि हम सकुशल बस्ती तक पहुंच जाए। अब हमारे पास भोजन-पानी कुछ नहीं था। चार दिन और तीन राते भूख-प्यास सहते हुए मजबूत आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहे। जितेंद्र ने बताया कि केदारनाथ में बाबा केदार के दर्शन के वह वासुकीताल से होते हुए रात तक त्रियुगीनारायण पहुंच जाते, लेकिन केदारनाथ से चार किमी ऊपर जाते ही चार से पांच फीट तक बर्फ मौजूद थी।
जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए कोहरा हमारी राह में रोड़े डालता रहा। दोपहर बाद वासुकीताल पहुंचे तो चारों तरफ घना कोहरा था। बताया कि दो मीटर की दूरी पर कुछ नहीं दिख रहा था। ऐसे में आगे बढ़ने का सवाल ही नहीं था। घने कोहरे के चलते हम चारों एक-दूसरे बातें करते रहे। भूख और प्यास से भी हालत खराब हो रही थी। बैग में दो बिस्कुट के पैकेट और दो पानी की बोतल थी, जो पलभर में खत्म हो गई। थोड़ी राहत मिली, लेकिन, अब हमारे पास खाने-पीने के लिए कुछ नहीं था। बतौर जगदीश मौसम सुधरने का इंतजार करते हुए रात घिर आई। ताल से वापस होते ही हम रास्ता भटक गए।
ऐसे में वहां बड़े से पत्थर की ओट में लाइटर की लाइट में बातें करते हुए रात गुजारी। अगले सुबह वासुकीताल से त्रियुगीनारायण के लिए निकलने वाली नदी को आधार बनाकर आगे बढ़ते रहे। बर्फ और कोहरे के बीच हम कहां जा रहे थे, कुछ पता नहीं चल रहा था। बस, कदम आगे बढ़ रहे थे। जैसे-जैसे दिन गुजरता भूख-प्यास से हालत खराब होती रहती। प्यास लगने पर वीरान क्षेत्र में खाई में उतरकर पानी पी रहे थे। हमारे पास जो स्मार्ट फोन थे, वे स्विच ऑफ हो गए थे। जबकि छोटे वाले मोबाइल पर सिग्नल नहीं मिल रहे थे, जिस कारण किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। जंगली जानवरों का भी डर था।
बृहस्पतिवार को तोषी गांव पहुंचते ही सबसे पहले परिजनों से बातचीत कर उन्हें अपनी कुशलक्षेम बताई तो वे भी फोन पर ही फफक-फफक कर रोने लगे। सोनप्रयाग के थानाध्यक्ष होशियार पंखोली के एक फोन पर तोषी गांव के नौ युवाओं ने तीन दिन तक तोषी से वासुकीताल तक लगभग 20 किमी ट्रेकिंग रूट का चप्पा-चप्पा छानते हुए चारों पर्यटकों को सकुशल खोजा और गांव पहुंचाया।