एक ओर जहां पूरे देश में दशहरे का उल्लास है वहीं एक गांव ऐसा भी है जहां पर विजयदशमी के दिन रावण दहन नहीं किया जाता बल्कि गांव लोग इस दिन युद्ध करते हैं। जानते हैं इस युद्ध के बारे में खास बातें...
उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर के उ्दपाल्टा और कुरोली गांव में रहने वाले लोग युद्ध की तैयारियों में जुटे हुए हैं। युद्ध भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि गागली युद्ध। हर साल श्राप से मुक्ति के लिए पश्चापात की आग में दो गांव के लोग दशहरे के दिन आपस में गागली युद्ध करते हैं।
युद्ध की तैयारियों में जुटे लोग नवरात्र शुरू होते ही गागली (अरबी) के डंठलों को काटकर सुखाने का काम शुरू कर देते हैं। उद्पाल्टा गांव के 70 वर्षीय राजेंद्र सिंह राय, हरि सिंह राय, गंगा सिंह राय, बीरबल सिंह राय आदि का कहना है कि किंवदंती है कि उद्पाल्टा गांव में हजारों साल पहले दो सहेलियां रानी और मुन्नी रहा करती थीं।
दोनों सहेलियां जंगल के पास कुएं पर पानी भरने के लिए जाया करती थीं। एक दिन रानी का पैर फिसल गया जिससे वह कुएं में गिरी गई और मर गई। जब मुन्नी ने ये बात परिजनों को बताई तो उन्होंने उसी पर उसकी हत्या का दोष मढ़ दिया। इसके बाद उसने भी उसी कुए में कूद कर जान दे दी। मान्यता है कि इससे परिजनों और गांव के लोगों को लड़कियों का श्राप लगने लगा।
उसी श्राप से बचने के लिए दोनों परिवारों को दशहरे के दिन आपस में गागली युद्ध करना पड़ता है। बताया जाता है कि दुर्गा अष्टमी के दिन दोनों लड़कियों की घास-फूंस की प्रतिमाएं तैयार की जाएंगी। जिन्हें ढोल-दमोऊ की थाप के बीच दशहरे के दिन कुएं में विसर्जित किया जाएगा। इसके बाद दोनों गांव के लोग आपस में युद्ध करते हैं। इस त्योहार को स्थानीय भाषा में पांइता पर्व भी कहा जाता है।