बदरीनाथ धाम के कपाट 10 मई को सुबह सवा चार बजे तीर्थयात्रियों के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। लेकिन हिंदूओं की आस्था के प्रतीक बदरीनाथ धाम के बारे में क्या आप जानते हैं कि इसकी कहानी एक मुस्लिम से भी जुड़ी है। चलिए जानते हैं धाम के बारे में ऐसी ही कुछ रोचक बातें।
बता दें कि बदरीनाथ धाम में होने वाली आरती एक मुस्लिम शायर ने लिखी है। ये शायर हैं फकरुद्दीन (बदरुद्दीन), जो चमोली जिले के नंदप्रयाग के रहने वाले थे। उन्होंने यह आरती महज 18 साल की उम्र में वर्ष 1865 में लिखी थी। तकरीबन 152 सालों से लगातार कपाट खुलने से बंद होने तक मंदिर में रोज सुबह-शाम यह आरती होती है। इस आरती में बदरीनाथ धाम के धार्मिक महत्व के अलावा यहां की सुंदरता के बारे में भी बताया गया है।
कहा जाता है कि बदरीनाथ की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी हुई है। यह मूर्ति चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। सिद्ध ऋषि-मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब यहां बौद्धों का प्रभाव बढ़ा तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरंभ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनंदा में फेंक गए। तब शंकराचार्य ने अलकनंदा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। इसके बाद मूर्ति पुन: स्थानांतरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुंड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की। मंदिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।
आपको जानकार हैरानी होगी कि बदरीनाथ में जिस दिन कपाट खुलते हैं उस दिन रावल साड़ी पहनकर पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना होती है और तभी कपाट खोले जाते हैं। इस मान्यता की वजह से ही पहाड़ में रावल को लोग भगवान की तरह पूजते हैं। वे उन्हें पार्वती का रूप भी मानते हैं। पहाड़ में जो लोग रावल को नहीं पूजते हैं, उन्हें अच्छा नहीं माना जाता है।
बद्रीनाथ के दो और नाम दिए गए हैं। बदरीनाथ एवं बद्रीविशाल। जानकारों के मुताबिक बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी (बैर) के जंगल थे, इसलिए इस क्षेत्र में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ की संज्ञा प्राप्त हुई। बद्रीनाथ धाम में पुजारी केरल के ब्राह्मण होते हैं। मंदिर में पूजा करने का अधिकार सिर्फ इन्हें ही होता है। केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मणों में से रावल का चयन बद्रीनाथ मंदिर समिति ही करती है।