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U19 CWC: मुंबई में गोलगप्पे बेचने वाले भदोही के लाल ने वर्ल्ड कप में किया कमाल, पाक के खिलाफ जड़ा शतक

स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: Rajeev Rai Updated Wed, 05 Feb 2020 08:34 AM IST
यशस्वी जायसवाल
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अंडर-19 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत ने पाकिस्तान को एकतरफा मुकाबले में हरा दिया है। दक्षिण अफ्रीका में मंगलवार को खेले गए मुकाबले में टीम इंडिया ने अपने चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को दस विकेट से हराते हुए रिकॉर्ड सातवीं बार फाइनल में जगह बनाई। भारत की इस जीत के हीरो रहे यशस्वी जायसवाल जिन्होंने टूर्नामेंट का अपना पहला शतक लगाया और एक अहम विकेट भी चटकाया। यशस्वी ने पूरे टूर्नामेंट में खेले गए पांच मुकाबले में तीन अर्धशतक और एक शानदार शतक जड़ा और एक मैच में 29 रन बनाकर नाबाद रहे। उन्होंने पूरे टूर्नामेंट के दौरान 156 की औसत से सर्वाधिक रन बनाए।

हालांकि अपने नाम की तरह ही 'यशस्वी', उत्तरप्रदेश के भदोही के इस लाल के लिए यहां तक का सफ़र इतना आसान नहीं था और उन्हें इसके लिए कड़ा संघर्ष और त्याग करना पड़ा। 10 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के भदोही से निकलकर मुंबई में भारतीय क्रिकेट के दिग्गजों के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए यशस्वी को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। क्रिकेटर बनकर देश की तरफ से खेलने के सपने ने उनके सामने कई चुनौतियां पेश की लेकिन वे अपने लक्ष्य को लेकर अडिग रहे और अपना काम करते रहे। 

ऐसे में आईए जानते हैं यशस्वी की उस बेहद भावनात्मक और प्रेरणादायी कहानी के बारे में जो कईयों के लिए प्रेरित करने वाली है। 
यशस्वी जायसवाल
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यशस्वी ने भूखे पेट तम्बू में गुजारी रातें
यशस्वी के पिता उत्तर प्रदेश के भदोही में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं और माँ गृहणी हैं। यशस्वी अपने घर के छोटे बेटे हैं। वह क्रिकेट में अपना भविष्य बनाने के लिए 10 साल की उम्र में ही मुंबई पहुंच गए। उनके पिता ने भी इसपर कोई आपत्ति नहीं उठाई क्योंकि परिवार को पालने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे।

यशस्वी के एक रिश्तेदार संतोष का घर मुंबई के वर्ली में जरूर है, लेकिन वह इतना बड़ा नहीं कि कोई अन्य व्यक्ति उसमें रह सके। इस वजह से मुस्लिम यूनाइटेड क्लब के मैनेजर संतोष ने वहां के मालिक से गुजारिश करके यशस्वी के रूकने की व्यवस्था करा दी। यशस्वी को वहां ग्राउंड्समैन के साथ टेंट में रहना पड़ता था।

इससे पहले यशस्वी एक डेयरी में रहते थे लेकिन बाद में उनका सामान उठाकर फेंक दिया गया और उन्हें बाहर निकाल दिया गया।
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यशस्वी जायसवाल
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पेट पालने के लिए रामलीला में बेचे गोलगप्पे
यशस्वी की एक और बड़ी बात यह है कि उन्होंने इतने दर्द सिर्फ इसलिए सहे ताकि उनके संघर्ष की कहानी कभी भदोही तक न पहुंचे, जिससे उनका क्रिकेट करियर खत्म हो जाए। 

यशस्वी अपना पेट पालने के लिए आजाद मैदान में राम लीला के दौरान पानी-पूरी (गोलगप्पे) और फल बेचने में मदद करते थे। मगर ऐसे भी दिन थे, जब उन्हें खाली पेट सोना पड़ता था क्योंकि जिन ग्राउंड्समैन के साथ वह रहते थे, वह आपस में लड़ाई करते थे और खाना नहीं बनाते थे।
दुकान पर यशस्वी के पिता को बधाई देते लोग
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परिवार को यादकर रोते थे यशस्वी
यशस्वी के मुताबिक़, 'राम लीला के दौरान मैं अच्छा कमा लेता था। लेकिन मैं प्रार्थना करता था कि टीम का कोई साथी पानी-पूरी खाने वहां न आ जाए। क्योंकि इससे उन्हें बुरा महसूस होता था।' यशस्वी कुछ पैसे कमाने के लिए हमेशा मेहनत करते रहे। कभी वह बड़े लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने जाते और रन बनाते तो सप्ताह बिताने के लिए उनके पास 200-300 रुपए हो जाते थे।

यशस्वी ने याद किया, 'मैंने हमेशा देखा कि मेरी उम्र के लड़के खाना लेकर आते थे या फिर उनके माता-पिता बड़े लंच बॉक्स लेकर आ रहे हैं। वहीं मेरे साथ मामला ऐसा था- खाना खुद बनाओ, खुद खाओ। नाश्ता नहीं था, तो किसी से गुजारिश करनी होती थी कि वह अपने पैसों से मुझे नाश्ता करा दे। दिन और रात का खाना टेंट में होता था, जहां यशस्वी की जिम्मेदारी रोटी बनाने की थी। 

यशस्वी के लिए दिन तो सही होते थे क्योंकि वह क्रिकेट खेलने और काम करने में व्यस्त रहते थे, लेकिन उनकी रातें लंबी हुआ करती थी। रातों को समय बिताना मुश्किल होता था। उस वक्त उन्हें अपने परिवार की बहुत याद आती थी और वे खूब रोते थे।
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यशस्वी
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सचिन ने गिफ्ट किया अपना बल्ला
सचिन के बेटे अर्जुन तेंदुलकर और यशस्वी जायसवाल दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं। इन दोनों की दोस्ती बेंगलुरु में स्थित राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी में हुई थी। उस वक्त अर्जुन और यशस्वी दोनों एक ही कमरे में रहते थे। एक बार अर्जुन ने यशस्वी की मुलाक़ात अपने पिता से करवाई थी। वे साल 2018 में यशस्वी को अपने घर ले गए और उन्हें सचिन तेंदुलकर से मिलवाया कजिसके बाद मास्टर ब्लास्टर भी उनके फैन हो गए।

पहली ही मुलाकात में सचिन ने यशस्वी से प्रभावित होकर उन्हें अपना बल्ला गिफ्ट में दे दिया। यही नहीं सचिन ने यशस्वी से अपने डेब्यू मैच में उसी बल्ले से खेलने की गुजारिश भी की।
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