भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर है। वन-डे टीम हारने के बाद विराट सेना ने जोरदार पलटवार किया। टी-20 सीरीज जीती, लेकिन अभी असल 'टेस्ट' शेष है। 17 दिसंबर यानी अगले गुरुवार से टेस्ट सीरीज का आगाज होने वाला है। पहला टेस्ट एडीलेड में डे-नाइट होगा, जिसे पिंक बॉल से खेला जाएगा। ऑस्ट्रेलिया इस गेंद की सबसे सफल टीम है, जिसने पांच में से पांच मैच जीते हैं। पिछले साल भारत भी लंबे इंतजार के बाद पिंक बॉल टेस्ट खेलने उतरा था, तब बांग्लादेश महज तीन दिन में ही हार गया था।
आखिर पिंक बॉल से ही क्यों खेला जाता है डे-नाइट टेस्ट मैच, जानें इस गेंद के बारे में सबकुछ
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पहली पिंक बॉल
इसका निर्माण ऑस्ट्रेलिया की बॉल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी कूकाबूरा ने किया था। कूकाबूरा ने कई साल तक इस नई पिंक बॉल को लेकर परीक्षण किया तब जाकर एक बेहतरीन गुलाबी गेंद बन पाई। पहली पिंक बॉल तो 10 साल पहले बन गई थी, मगर इसकी टेस्टिंग करते-करते पांच-छह साल और लग गए। आखिरकार 2015 में एडीलेड में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए पहले डे-नाइट टेस्ट पिंक बॉल से खेला गया। बाद में इस नई गेंद का सफर बढ़ चला।
गुलाबी रंग ही क्यों?
टेस्ट क्रिकेट सफेद जर्सी में खेला जाता है, तो इसलिए उसमें लाल रंग की गेंद का इस्तेमाल होता है, ताकि गेंद आसानी से नजर आए। उसी तरह वन-डे रंगीन कपड़ों में होता है, ऐसे में उसमें सफेद गेंद इस्तेमाल होती है। अब डे-नाइट टेस्ट में गुलाबी रंग की गेंद का ही क्यों इस्तेमाल होता है, यह सवाल तमाम क्रिकेट फैंस के जेहन में उभर रहा होगा। शुरुआत में पीली और नारंगी जैसी कई रंगों की गेंदों को बतौर प्रयोग आजमाया गया, जो कैमरा फ्रेंडली नहीं थी। दरअसल मैच कवर कर रहे कैमरामैन ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा था कि ऑरेंज कलर को कैमरा के लिए कैप्चर कर पाना काफी मुश्किल होता है, यह गेंद दिखाई नहीं देती। इसके बाद सबकी सहमति से पिंक कलर को चुना गया।
16 तरह के पिंक शेड्स में चुना गया एक
एक बार गुलाबी रंग पर मुहर लगने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी कि पिंक में भी कैसा पिंक कलर होगा। इसके लिए करीब पिंक के 16 शेड्स ट्राई किए गए। परीक्षण करने पर हर बार उसमें बदलाव देखने को मिला। अंत में एक आइडियल शेड को चुना गया, जिसकी बनी गेंद अब डे-नाइट टेस्ट मैच में इस्तेमाल होती है। रंग तय हो जाने के बाद बड़ी समस्या सिलाई के धागे को चुनने की थी। कूकाबूरा कंपनी ने पिंक बॉल की सिलाई सबसे पहले काले रंग के धागे से की थी। फिर हरा रंग इस्तेमाल हुआ, फिर सफेद कलर के धागे का प्रयोग हुआ। अंत में हरे रंग की सिलाई पर सबकी सहमति बनी, लेकिन भारतीय टीम ने बांग्लादेश के खिलाफ काले रंग के धागे वाली पिंक बॉल से मैच खेला था।
निर्माण प्रक्रिया
रेड और पिंक बॉल की निर्माण प्रक्रिया में कोई बड़ा अंतर नहीं है। अंदर से यह दोनों गेंदें एक तरह की होती है बस अंतर है तो इनकी कलर कोटिंग का। बाकि बाउंस, हार्डनेस और परफॉर्मेंस के लिहाज से यह दोनों गेंद एक जैसी हैं। रेड बॉल में लेदर को लाल रंग से रंग कर उसकी घिसाई की जाती है जबकि गुलाबी गेंद में गुलाबी, लेकिन फिनिशिंग के दौरान पिंक बॉल पर रंग की एक और परत चढ़ाई जाती है। इसकी वजह से गेंद का रंग कुछ अधिक अंतराल तक चमकीला बना रहा है। यानी शाइन बरकरार रहती है।