देशभर में मंगलवार को दशहरे का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। वहीं हमारे देश में एक जगह ऐसा भी है जहां दशहरा पर्व 10 दिनों तक नहीं बल्कि 75 दिनों तक मनाया जाता है। वह जगह है छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का जगदलपुर। यहां का दशहरा छत्तीसगढ़ या भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। देश-विदेश के पर्यटक यहां दशहरा देखने आते हैं। बस्तर के दशहरे में पौराणिक, ऐतिहासिक, स्थानीय वनवासी परंपराओं और तंत्र साधना का मेल नजर आता है। दशहरे का मतलब यहां पर परंपरा, प्रकृति और मां दांतेश्वरी देवी की पूजा से है। 13वीं शताब्दी में बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव ने इस त्योहार की परंपरा शुरू की थी।
यहां दशहरे पर रथ चुरा ले जाते हैं आदिवासी, राजा को करनी पड़ती हैं मिन्नतें
बस्तर अपनी आदिवासी जनसंख्या और उनके सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवहार के लिए जाना जाता है। बस्तर में आज भी कई आदिवासी जनजातियां रहती हैं जो वास्तव में वनवासी संस्कृति का पोषण करती हैं। बस्तर की एक महत्वपूर्ण पहचान यहां मनाया जाने वाला दशहरा है। बस्तर क्षेत्र में दशहरा लगभग 75 दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें आखिरी के पंद्रह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। पूरे 75 दिन तक चलने वाले दशहरे की शुरुआत 'पाठजात्रा' से होती है। पाठजात्रा अनुष्ठान के अंतर्गत स्थानीय निवासियों द्वारा जंगल से लकड़ियां एकत्रित की जाती हैं जिसका उपयोग विशालकाय रथ बनाने में होता है।
मान्यता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय नरेश पुरूषोत्तम देव ने एक बार बस्तर से जगन्नाथपुरी तक पैदल यात्रा की थी। इस यात्रा में उनके साथ स्थानीय आदिवासी भी गए। जगन्नाथपुरी मंदिर पहुंचने पर राजा पुरुषोत्तम देव ने मंदिर को एक लाख स्वर्ण मुद्राएं एवं आभूषण भेंट किए। मंदिर में राजा को 'रथपति' घोषित कर दिया गया। रथपति की उपाधि से अलंकृत होकर राजा ने यात्रा से वापसी के पश्चात बस्तर में दशहरे के दौरान रथ चलाने की प्रथा शुरू की। तब से अब तक लगभग छ: सदियां गुजर चुकी हैं, लेकिन बस्तर का दशहरा उसी उत्साह और मां दंतेश्र्वरी देवी के प्रति श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।
देवी-देवताओं को भेजा जाता है आमंत्रण
बड़ी बात यह है कि पर्यटक ही नहीं, यहां देवी-देवता भी दशहरा देखने जाते हैं। देवी-देवताओं को दशहरा देखने के लिए आमंत्रण भी दिया जाता है। बस्तर के तहसीलदार द्वारा समस्त ग्रामों के देवी देवताओं को दशहरा में शामिल होने के लिए आमंत्रण भेजा जाता है। जिसमें 6166 ग्रामीण प्रतिनिधि बस्तर दशहरे की पूजा विधान को संपन्न कराने के लिए विशेष तौर पर शामिल होते हैं। इसके साथ ही हजारों देवी-देवताओं के साथ लाखों ग्रामीण बस्तर दशहरा में शामिल होते हैं। बस्तर विशिष्ट परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। इसमें ऐतिहासिक बस्तर दशहरे में देवी-देवताओं, पुजारी, मांझी, परगना प्रमुख और मुखिया की भी प्राचीन परंपरा रही है। इस परंपरा को सहेजकर रखने के लिए जिला प्रशासन की ओर से भी कदम उठाए जा रहे हैं।
बस्तर दशहरा में शामिल होने वाले देवी-देवताओं में रांधना, कोकोड़ी, बालोंड, भाटगांव, पिटिसपाल, पाथरी, बालेंगा, मांडोकीखरगांव, खुटडोबरा, चरकई, खालेपारा, कोपाबेड़ा, अरगुला, तारगांव, छोटेराजपुर, किबेकोंगा, डोडरेसिमोड़ा, तितरवंड, बड़डोई, डोंगरसिलाटी, हल्दा, बिवला, आमानार, गम्हरी, फुंडेरपानी, गडरासिमोड़ा की मां हिंगलाजिन, मावली माता, आंगादेव, बूढ़ी माता, शीतला माता, चिलगाईन माता, फुलकुंवर, कुंवारी मावली, सोनादई, भंडारिन माता आदि शामिल हैं।
दशहरे में चोरी की भी है रस्म
बस्तर के दशहरे में एक अनोखी परंपरा रथ चुराने की भी है। रात को माड़िया जनजाति के आदिवासी रथ को चुरा कर कुम्हाड़कोट नाम की जगह पर ले जाते हैं। बस्तर दशहरे की हर रस्म के लिए आदिवासियों की अलग-अलग जनजातियों को जिम्मेदारी दी जाती है। इस तरह हर जनजाति इसका हिस्सा बनती है। बताया जाता है कि जब पहली बार बस्तर दशहरा मनाया गया था तब माड़िया जनजाति को कोई काम नहीं दिया गया था, जिससे वे नाराज हो गए और उन्होंने रथ चुरा लिया था। अगले दिन बस्तर के महाराज को जाकर उन्हें मनाना पड़ा था। उस वक्त उन्होंने महाराज को अपने साथ बैठकर खाना खाने को कहा था, खाना खाने के बाद ही रथ वापस किया गया था। इसके बाद रथ चोरी भी परंपरा का हिस्सा बन गई। जो आज भी कायम है।