देखिए, पंजाबी हलवाई के बेटे की बहू कैसे बनी मुंबई की 'मां'?
मारपीट, दहेज के आरोपों और अपने पहरावों को लेकर सुर्खियों में छाई ‘राधे मां’ पंजाब के हलवाई के बेटे की बहू थी, तो वह मुंबई की 'मां' कैसे बन गई? जानिए सच। रिपोर्टः संजीव कुमार बख्शी, होशियारपुर
देखिए, पंजाबी हलवाई के बेटे की बहू कैसे बनी मुंबई की 'मां'?
राधे मां उर्फ गुड़िया उर्फ सुखविंदर कौर का जन्म 1964 में गांव दोरांगला (गुरदासपुर) में हुआ था। जब सुखविंदर कौर 17 साल की थी तो उनका विवाह करम सिंह हलवाई के बेटे मोहन सिंह के साथ हो गया। मोहन सिंह ने कुछ समय मिठाई की दुकान की और फिर दोहा कतर चला गया।
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पति का विदेश जाना राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दौरान उसने कपड़े भी सिले और जल्द ही अध्यात्म की दिशा में मुड़ गई। 23 साल की उम्र में सुखविंदर मुकेरियां में डेरा परमहंस बाग के महंत रामाधीन दास की शिष्या बन गई। महंत ने उसे आध्यात्मिक दीक्षा दी और ‘राधे मां’ के रूप में नया नाम दिया।
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नया नाम मिलने के बाद वह सत्संग करने लगी और खानपुर में मां भगवती मंदिर राधे मां का आध्यात्मिक केंद्र बन गया। लोग कहते हैं कि इस तरह के सत्संग के दौरान वह अपने भक्तों को वरदान देती थी जिससे उनके संकट दूर रहते थे। ऐसा ही एक आशीर्वाद राधे मां ने मुंबई के एक भक्त को दिया और उसका कोई गंभीर मसला हल हो गया।
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वही भक्त राधे मां को मुंबई ले गया। इसके बाद वह नियमित रूप से मुकेरियां आती रहीं। बाद में वह मुंबई में अपनी आध्यात्मिक बैठकों में व्यस्त हो गई और पति और दो बेटों के साथ मुंबई में ही रहना शुरू कर दिया। तब से राधे मां का मुकेरियां आना कम हो गया। अंतिम बार वह पिछले साल राम नवमी पर मुकेरियां आई थीं।