‘पाक में मेरी परछाई थी, सामने अब्बू थे, पीछे सूरज था। मैं रिफ्यूजी था। बस चलते रहना था। जैसे ही वाघा बार्डर पार किया तो जैसे लगा कि बचपन पाक में रह गया हो। रूह और शरीर दोनों अलग-अलग हो गए हो...
...मैं कई वर्षों बाद जब अपनी जन्मभूमि पाकिस्तान पर लौटा तो देखा गांव का छप्पर वैसा ही था। मेरा पुश्तैनी पर कोई और परिवार रह रहे थे। मुझे जिसने देखा वो मेरे से अलग होने का नाम नहीं ले रहा था। मैं चाहता था कि मैं कुछ देर एकांत में बैठकर दिल का गुबार निकालूं और रो सकूं, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका।’
18 अगस्त, 1936 को पंजाब (पाकिस्तान अधीन) में जन्म लेने वाले संपूर्ण सिंह कालड़ा भी दोनों मुल्कों के लाखों विस्थापित परिवारों की तरह गुमनामी में जी रहे होते, लेकिन किस्मत में कुछ और लिखा था।
आज संपूर्ण सिंह कालड़ा को लोग गुलजार के नाम से जानते हैं। फिल्मी दुनिया से लेकर साहित्यिक क्षेत्र में उनकी लिखी हर पंक्तियां इबारत बन जाती हैं। लेकिन आज जब गुलजार ने दोनों मुल्कों के विभाजन पर विश्व के पहले पार्टीशन म्यूजियम में कदम रखा तो उनकी आंखें सजल हो उठी। जुबां खामोश थी।
गुलजार ने म्यूजियम में भारत-पाक से जुड़ी यादें देखीं तो काफी देर तक वो निहारते रहे। कहने लगे कि इतनी जल्दी समय बीत गया पता ही नहीं चला। दोनों मुल्कों के बीच ऐसे म्यूजियम बनाए जाना चाहिए। मैं पाक से अपील करता हूं कि विभाजन की निशानी वो संभाल कर रखें और भारत में हम संभाल ही रहे हैं। दोनों मुल्कों को बंटवारे के बाद प्यार व मुहब्बत से रहना चाहिए।