देखिए, एक भिक्षुक कैसे बने हिमाचल प्रदेश के नए गवर्नर
गुरुकुल के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांग चुके डॉ. देवव्रत आचार्य अब देवभूमि हिमाचल प्रदेश के नए गवर्नर होंगे। देखिए, उनका सफर। डॉ. देवव्रत आचार्य अपने परिवार के साथ।
देखिए, एक भिक्षुक कैसे बने हिमाचल प्रदेश के नए गवर्नर
आर्य समाज की शिक्षा की अलख जगा रहे आचार्य देवव्रत को गवर्नर बनाने की सूचना मिलते ही उन्हें बधाई देने वालों का तांता लग गया। आचार्य वर्ष 1981 में कुरुक्षेत्र गुरुकुल में बतौर आचार्य के पद पर आसीन हुए थे। उन्होंने अपने 34 वर्ष के कार्यकाल के दौरान गुरुकुल को बुलंदियों तक पहुंचाया।
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मूल रूप से पानीपत जिले के समालखा के गांव पावती के रहने वाले आचार्य देवव्रत का जीवन शिक्षा को ही समर्पित है। आचार्य देवव्रत का जन्म 18 जनवरी 1959 को हुआ था। पावती गांव निवासी लहरी सिंह के पांच पुत्रों में एक देवव्रत शुरू से ही आर्य समाज से काफी प्रभावित रहे। 1978 में दयानंद ब्रह्म विद्यालय से विद्या वाचस्पति और 1982 में दयानंद महाविद्यालय ज्वालापुर, हरिद्वार, उत्तराखंड से विद्या भास्कर (बीए) उत्तीर्ण की। इसके बाद स्नातकोत्तर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से 1984 में और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से 1991 में बीएड की डिग्री हासिल की। इसके बाद इतिहास में स्नातकोत्तर 1996 में और वर्ष 2000 में डिप्लोमा इन योग विज्ञान और 2002 में डॉक्टर ऑफ नेचुरोपैथी एंड यौगिक साइंस की डिग्री हासिल की।
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भिक्षुक से राजभवन तक की दूरी आचार्य डॉ. देवव्रत ने यूं ही तय नहीं की,बल्कि उनकी साधना, तपस्या,संस्कार और गौ सेवा के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है। राज्यपाल बनने जा रहे डॉ.देवव्रत शिक्षा,चिकित्सा और स्वस्थता के मिशन में लंबे समय से जुटे हैं। वर्ष 1981 से गुरुकुल कुरुक्षेत्र की शान रहे डॉ.देवव्रत आचार्य को वर्ष 2003 में यूएसएस सर्टिफिकेट एक्सीलेंसी अवॅर्ड भी मिल चुका है।
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एक दौर में जिस गुरुकुल को कुछ खास श्रेणी के ही विद्यार्थियों का शिक्षण केंद्र माना जाता था। आज उसमें देश के विभिन्न राज्यों के विद्यार्थी योग्यताओं के मापदंड तय करने के बाद बमुश्किल दाखिला ले पाते हैं। उल्लेखनीय है कि आचार्य देवव्रत गुरुकुल के लिए घर-घर जाकर भिक्षा मांगने का भी काम कर चुके हैं। वे आज भी कहते हैं कि शिक्षा की अलख जगाने में मेरी नहीं, बल्कि उन शिक्षा प्रेमियों का योगदान हैं,जिन्होंने मुझे भिक्षा देने में कभी गुरेज नहीं की और अपनी तिजोरियों के दरवाजे गुरुकुल के लिए खोल दिए।