चार अगस्त, 1972, युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने युगांडा में वर्षों से रह रहे 60000 एशियाइयों को अचानक देश छोड़ देने का आदेश दे दिया है। उन्होंने ये भी ऐलान किया कि उन्हें देश छोड़ने के लिए सिर्फ 90 दिन का समय दिया जाता है। छह फीट चार इंच लंबे और 135 किलो वजन वाले ईदी अमीन को हाल के विश्व इतिहास के सबसे क्रूर और निर्दयी तानाशाहों में गिना जाता है।
दुनिया का वो क्रूर तानाशाह, जो शवों के साथ एकांत में रहने का रखता था शौक
एशियाइयों को निकालने की सलाह मिली थी कर्नल गद्दाफी से
शुरू में अमीन की इस घोषणा को एशियाई लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा कि अमीन ने अपने सनकपन में ये ऐलान कर दिया है। लेकिन थोड़े दिनों में उन्हें पता चल गया कि अमीन उन्हें अपने देश से बाहर कर देने के लिए उतारू हैं। वैसे तो बाद में अमीन ने कई बार स्वीकार किया कि ये फैसला लेने की सलाह अल्लाह ने उनके सपने में आ कर दी थी, लेकिन अमीन के शासन पर बहुचर्चित किताब 'गोस्ट ऑफ कंपाला' लिखने वाले जॉर्ज इवान स्मिथ लिखते है, 'इसकी प्रेरणा उन्हें लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी से मिली थी, जिन्होंने उन्हें सलाह दी थी कि उनके देश पर उनकी पकड़ तभी मजबूत हो सकती है, जब वो उसकी अर्थव्यवस्था पर अपना पूरा नियंत्रण कर लें। उन्होंने उनसे कहा कि जिस तरह उन्होंने अपने देश में इटालियंस से पिंड छुड़ाया है, उसी तरह वो भी एशियाइयों से अपना पिंड छुड़ाएं।'
अमीन ने कहा, ''एशियाइयों ने अपने आप को युगांडावासियों से अलक-थलग कर लिया है और उन्होंने उनके साथ मिलने जुलने की कोई कोशिश नहीं की है। उनकी सबसे ज्यादा रुचि युगांडा को लूटने में रही है। उन्होंने गाय को दुहा तो है, लेकिन उसे घास खिलाने की तकलीफ गवारा नहीं की है।'
सिर्फ 55 पाउंड ले जाने की इजाजत
जब ये घोषणा हुई तो ब्रिटेन ने अपने एक मंत्री जियॉफ्री रिपन को इस मंशा से कंपाला भेजा कि वो अमीन को ये फैसला बदलने के लिए मना लेंगे। लेकिन जब रिपन वहां पहुंचे तो अमीन ने कहलवाया कि वो बहुत व्यस्त होने के कारण अगले पांच दिनों तक उनसे नहीं मिल पाएंगे। रिपन ने लंदन वापस लौटने का फैसला किया। जब उनके अधिकारियों ने उन्हें समझाया तो चौथे दिन अमीन जा कर रिपन से मिलने को तैयार हुए। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। अमीन अपने फैसले पर अड़े रहे।
भारत सरकार ने भी स्थिति का जायजा लेने के लिए भारतीय विदेश सेवा के एक अधिकारी निरंजन देसाई को कंपाला भेजा। निरंजन देसाई याद करते हैं, 'जब मैं कंपाला पहुंचा तो वहां हाहाकार मचा हुआ था। उनमें से बहुत से लोग अपनी पूरी जिंदगी में युगांडा से बाहर नहीं गए थे। हर व्यक्ति को अपने साथ सिर्फ 55 पाउंड और 250 किलो सामान ले जाने की इजाजत थी। कंपाला से बाहर रहने वाले एशियाइयों को इन नियमों की भी जानकारी नहीं थी।'
लोगों ने लॉन में अपना सोना गाड़ा
अमीन का ये फैसला इतना अचानक था कि युगांडा की सरकार इस लागू करने के लिए तैयार नहीं थी। कुछ अमीर एशियाइयों ने अपने धन को खर्च करने का नायाब तरीका निकाला। निरंजन देसाई बताते हैं, 'उन लोगों में इस तरह की सोच बन गई कि अगर आप अपना पैसा बाहर नहीं ले जा सकते हैं तो उसे स्टाइल से उड़ा दीजिए। कुछ अक्लमंद लोग अपना पैसा बाहर ले जाने में कामयाब भी हो गए। सबसे आसान तरीका था पूरी दुनिया घूमने का पूरे परिवार के लिए फर्स्ट क्लास टिकट खरीदना जिसमें एम सीओ के जरिए होटल बुकिंग पहले से ही कर दी गई हो।'
उन्होंने कहा, 'इन एमसीओ (मिसिलेनियस चार्ज ऑर्डर) को बाद में युगांडा से निकलने के बाद भुनाया जा सकता था। कुछ लोगों ने अपनी गाड़ियों की कार्पेट के नीचे जेवर रख कर पड़ोसी देश कीनिया पहुंचाए। कुछ लोगों ने पार्सल के जरिए अपने जेवर इंग्लैंड भेज दिए। दिलचस्प बात ये है कि ये सभी अपने गंतव्य स्थान पर सुरक्षित पहुंच भी गए। कुछ को उम्मीद थी कि वो कुछ समय बाद वापस युगांडा लौट आएंगे। इसलिए उन्होंने अपने जेवर अपने लॉन या बगीचे में गाड़ दिए। मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जानता हूं जिन्होंने अपने जेवर बैंक ऑफ बड़ोदा की स्थानीय ब्रांच के लॉकर में रखवा दिए। उनमें से कुछ लोग जब 15 साल बाद वहां गए तो उनके जेवर उस लॉकर में सुरक्षित थे।'
उंगली से अंगूठी काट कर उतरवाई गई
इस समय लंदन में रह रही गीता वाट्स को वो दिन अब भी याद हैं जब वो लंदन जाने के लिए एनतेबे हवाई अड्डे पहुंची थीं। गीता बताती हैं, ''हम लोगों को अपने साथ ले जाने के लिए सिर्फ 55 पाउंड दिए गए थे। जब हम हवाई अड्डे पहुंचे तो लोगों के सूटकेस खोल कर देखे जा रहे थे। उनकी हर चीज बाहर निकाल कर फेंकी जा रही थी, ताकि वो देख सकें कि उसमें सोना या पैसा तो छिपा कर नहीं रखे गए हैं।''
'पता नहीं किस वजह से मेरे माता-पिता ने मेरी उंगली में सोने की एक अंगूठी पहना दी थी। हमसे कहा गया कि मैं अंगूठी उतार कर उन्हें दे दूं। अंगूठी इतनी कसी थी कि मेरी उंगली से उतर ही नहीं रही थी। आखिर में उन्हेंने उसे काट कर मेरी उंगली से अलग किया। सबसे खतरनाक चीज ये थी कि जब अंगूठी को काटा जा रहा था, तो ऑटोमेटिक हथियार लिए युगांडाई सैनिक हमें घेर कर खड़े थे।'