महाराष्ट्र के अलीबाग शहर में अगर आप पर्यटकों से भरी जगह से आगे बढ़कर लोगों से पूछेंगे कि सिनेगॉग कहां है, तो शायद आपको इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा। 'मागन ऑबोथ' जैसे मशहूर सिनेगॉग के बारे में इन लोगों को नहीं पता! ये सवाल आपके मन में आ सकता है। मेरे मन में भी यह सवाल आया लेकिन तभी एक स्थानीय महिला ने मुझसे पूछा, "आप सिनेगॉग नहीं, मशीद (मस्जिद) कहिए।" जब मैंने मस्जिद पूछा तब जाकर लोगों की समझ में आया।
जब भारत में मुस्लिम रियासत का प्रधानमंत्री बन गया एक यहूदी
आप सोचेंगे कि जहां पूरी दुनिया में मुसलमानों और यहूदियों में विवाद है, वहां कोई सिनेगॉग को मस्जिद कैसे कह सकता है? लेकिन इसके बाद आपको कई और ऐसे झटके लगेंगे और धीरे-धीरे 'बेने इसराइली' के बारे में पता चलेगा। आज संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और इसराइल के बीच हुई शांति वार्ता से सब हैरत में हैं। यहां तक कि येरुशलम, वॉशिंगटन और दुबई में बैठे नेताओं को भी शायद इस पर भरोसा नहीं हो रहा होगा। मुसलमान और यहूदी जैसे दो धर्मों में बंटे देशों में शांति समझौता कैसे हो सकता है? यूएई जैसा एक मुसलमान देश इसराइल को बिना शर्त कैसे मान्यता दे सकता है?
भारत में छिपी अतीत की साझीदारी
भारतीय मुसलमानों और यहूदियों (खास तौर से मराठी बेने इसराइली) ने कई सदियों पहले एक साथ मिल-जुलकर रहने की मिसाल कायम की थी। 1948 में इसराइल बनने के बाद शायद ही कोई साल शांतिपूर्ण रहा होगा लेकिन महाराष्ट्र में सिर्फ मुसलमान और यहूदी ही नहीं बल्कि हिंदू, पारसी और ईसाई, सभी धर्मों के लोग खुशी-खुशी साथ रहते हैं। इतना ही नहीं, महाराष्ट्र के इतिहास में एक मुसलमान रियासत का शासन एक यहूदी व्यक्ति संभाल चुका है।
रोमन सल्तनत ने जब येरुशलम का यहूदी मंदिर (सिनेगॉग) तोड़ा तब यहूदियों ने ज्युडेआ प्रांत (मौजूदा इसराइल) और नॉर्दन गॅलीली को छोड़ दिया। सन् 135 यानी अब से 1885 वर्ष पहले जब रोमन लोगों ने उनके इलाके पर कब्जा कर लिया तो वो अपना धर्म और संस्कृति बचाने के लिए यहूदी रोमन साम्राज्य से पलायन करने पर मजबूर हो गए। यहूदियों की टोलियां दुनिया भर के अनेक देशों मे जाकर बस गईं। इन टोलियों को 'लॉस्ट ट्राइब्स' कहा जाता है और भारत में आए बेने इसराइली, कोचीन में आये यहूदी और मणिपुर में बसे बेने मनाशे इसी बिरादरी के माने जाते हैं। इस तरह बेने इसराइली लोगों और भारत का नाता 1800 साल से ज्यादा पुराना है।
मुरुड-जंजिरा रियासत
अब बात उस मुसलमान रियासत की जिसने एक यहूदी को अपना प्रधानमंत्री बनाया। मुरुड-जंजिरा रियासत महाराष्ट्र के पश्चिम किनारे पर थी। यहां सिद्दी समुदाय का शासन था। अरबी भाषा में टापू को 'जजीरा' कहा जाता है, इसी जजीरा शब्द का अपभ्रंश जंजिरा बना क्योंकि वह एक टापू पर बना किला था। दादी रुस्तमजी बनाजी की किताब 'बॉम्बे ऐंड द सिद्दिज' में इसकी जानकारी मिलती है।
यहूदियों की ही तरह सिद्दी समुदाय भी बाहर से भारत में आया और यहीं बस गया। सातवीं सदी में अफ्रीका से आये सिद्दी पहले गुलाम और उसके बाद शूर वीर सैनिक बनकर भारत के कई हिस्सों में फैल गए। उन्हीं में से एक मलिक अंबर अहमदनगर राज्य में प्रधानमंत्री भी बने। जमातउद्दीन याकूत नाम के सिद्दी गुलाम दिल्ली की मल्लिका रजिया सुल्तान के खास माने जाते थे। जंजिरा और जाफराबाद एक सिद्दी रियासत थी और उसके बाद गुजरात में सचिन रियासत सिद्दियों ने हासिल की। उनकी लड़ने की क्षमता, कद-काठी देखकर अनेक राजाओं ने उन्हे आश्रय दिया और अपनी सेना मे भर्ती किया। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों में आज भी सिद्दी रहते हैं। पाकिस्तान में बलूचिस्तान और सिंध प्रांत में भी सिद्दी रहते हैं।
सिद्दी समुदाय के आधिपत्य में रहे जंजिरा किले को कभी कोई मराठी राजा या पेशवा नहीं जीत सका। साल 1948 में भी भारत में शामिल होने के बाद यह जंजिरा किला मराठी प्रांत की परिधि में नहीं आया। सतारा के शाहू महाराज, पेशवा और सिद्दी समुदाय के आपसी संघर्ष की कल्पना गोविंद सखाराम सरदेसाई की लिखी 'मराठी रियासत खंड-3' पढ़ कर की जा सकती है। मुरुड-जंजिरा रियासत के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरानी किताबों में 'हबसान' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि 'हबसान' अबीसीनिया (आज का इथिओपिया) शब्द का अपभ्रंश है। उस समय सिद्दी समुदाय को महाराष्ट्र में 'हब्शी' कहा जाता था। इस रियासत के दीवान का पद शलोम बापूजी वारघरकर के पास था। दीवान पद को 'स्टेट कारभारी' भी कहा जाता था।
शलोम बापूजी इसराइल वारघरकर
शलोम बापूजी इसराइल वारघरकर का जन्म 7 अगस्त 1853 को बेलगांव में हुआ था। कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद उन्होंने क्लर्क की नौकरी हासिल की, बाद में वो हेडक्लर्क बन गए। उन्होंने साल 1872 से काम शुरू किया और 1888 में जंजिरा के नवाब ने उन्हें 'खान साहेब' के खिताब से नवाजा। इसके बाद जल्द ही उन्हें 'खान बहादुर' की उपाधि भी मिली। इतना ही नहीं, साल 1891-96 तक वो जंजिरा सल्तनत के दीवान रहे। यानी इस दौरान रियासत का कामकाज उन्होंने ही संभाला। उस समय अहमद खान सिद्दी इब्राहिम खान जंजिरा के नवाब थे।
इस बारे में तेल अवीव (इसराइल) में रहने वाले इतिहासकार एलियाज दांडेकर ने बीबीसी मराठी से बात की। उन्होंने बताया कि, "मुरुड जंजिरा रियासत में मुसलमान और हिंदू, दोनों ही समुदायों के लोग थे। शलोम ने दोनों समुदायों के बीच एकता कायम करने के लिए काम किया।"