Mysterious Temples: ये हैं मां दुर्गा के बेहद रहस्यमयी मंदिर, जानिए इनके बारे में रोचक तथ्य
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बताया जाता है कि इस पत्थर से महीने में एक बार खून की धारा बहती है। यह क्यों और कैसे होता है। इस बात का पता आज तक वैज्ञानिक भी नहीं लगा पाए हैं। हर साल मानसून के दौरान इस मंदिर को तीन के लिए बंद कर दिया जाता है। ऐसा देवी के मासिक धर्म के दौरान किया जाता है और बताया जाता है कि गर्भग्रह से बहने वाला झरना उन तीन दिनों में लाल हो जाता है।
ज्वाला देवी मंदिर
हिमाचल प्रदेश की कालीधार पहाड़ी के बीच माता ज्वाला देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, यहां पर माता सती की जीभ गिरी थी। माता सती के जीभ के प्रतीक के तौर पर ज्वाला मुखी मंदिर में धरती से ज्वाला निकलती है। यह ज्वाला नौ रंग की होती है। यहां पर नौ रंगों की निकलने वाली ज्वालाओं को देवी शक्ति का नौ रूप माना जाता है। यह ज्वाला महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजी देवी की रूप है। मंदिर में निकलने वाली ज्वालाएं कहां से निकलती हैं और इनका रंग कैसे बदलता है। आज तक इस बात की कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।
मंदिर में जल रही ज्वाला को मुस्लिम शासकों ने कई बार बुझाने की कोशिश की, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली। वैज्ञानिक भी यह पता नहीं लगा पाए हैं कि ज्वाला कहां से निकलती है। मंदिर में स्थित ज्वाला को मुगल शासनकाल में अकबर ने भी बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इसके बाद देवी मां को स्वयं पचास किलो का छत्र चढ़ाया, लेकिन माता ने उस छत्र को स्वीकार नहीं किया और वह गिर गया। यह छत्र अभी भी मंदिर परिसर में रखा है।
मंगला गौरी मंदिर
गया शहर से कुछ दूरी पर स्थित भस्मकूट पर्वत पर शक्तिपीठ मां मंगलागौरी मंदिर स्थित है। धार्मिक मान्यता है कि मां सती का वक्ष स्थल (स्तन) गिरा था। यह शक्तिपीठ 'पालनहार पीठ' या 'पालनपीठ' नाम से प्रसिद्ध है। यह शक्तिपीठ असम के मां कमाख्या देवी शक्तिपीठ के समान माना जाता है। मान्यताओं के मुताबिक, गया में सती का स्तन मंडल भस्मकूट पर्वत पर गिरे थे और दो पत्थर बन गए थे। प्रस्तरमयी स्तन मंडल में मां मंगलागौरी हमेशा निवास करती हैं। मान्यता है कि जो लोग शिला का स्पर्श करते हैं, वो अमरत्व को प्राप्त कर करते हैं और ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। इस शक्तिपीठ की खास बात यह है कि मनुष्य जीवित रहते ही अपना श्राद्ध कर्म यहां संपादित कर सकता है।