Loudspeaker Invention: भारत में इन दिनों लाउडस्पीकर की चर्चा चारों तरफ हो रही है। देशभर में लाउडस्पीकर को लेकर सियासत गर्म है। आवाज को दूर तक पहुंचाने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कार्यक्रम, रैली, पूजा और प्रवचन में दूर तक आवाजा पहुंचाने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल होता है। हालांकि आज कल लाउडस्पीकर को लेकर हंगामा मचा हुआ है। क्या आपको पता है कि विवाद की वजह बना लाउडस्पीकर कब और कैसे बना था? आज हम आपको इसके बारे में बताने जा रहे हैं कि आखिर लाउडस्पीकर का आविष्कार कब और कैसे हुआ था।
अजब-गजब: कब और कैसे हुआ था लाउडस्पीकर का आविष्कार? जानिए इसके बारे में रोचक तथ्य
जब पहली बार रेडियो में लगाया गया
समय के साथ लाउडस्पीकर में कई बदलाव किए गए और बड़ा बनाया गया। धातु से बनने वाले लाउडस्पीकर को ऐसा बनाया गया कि इसकी आवाज दूर तक पहुंचे और लोगों को साफ-साफ सुनाई दे। दुनियाभर में लोग लाउडस्पीकर को पसंद करने लगे। साल 1924 में रेडियो में पहली बार लाउडस्पीकर को लगाया था। चेस्टर डब्ल्यू राइस और एटीएंडटी के एडवर्ड डब्ल्यू केलॉग ने यह काम किया था।
इसके अलावा साल 1943 में आल्टिक लैनसिंग ने डुपलेक्स ड्राइवर्स और 604 स्पीकर्स बनाया जिनको 'वॉयस ऑफ द थियेटर' कहा जाता है। इसके बाद एडगर विलचर ने साल 1954 में एकॉस्टिक सस्पेंशन को खोजा और फिर स्पीकर्स वाले म्यूजिक प्लेयर्स की शुरुआत हुई।
जानिए कैसे करता है काम
लाउडस्पीकर या स्पीकर का इस्तेमाल आवाज को दूर तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। इससे किसी भी प्रकार की ध्वनि को सुना जा सकता है। यह विद्युत तरंगों को आवाजा में बदलने का काम करता है। इससे किसी विद्युत तरंग को अलग-अलग फ्रिक्वेंसी में रिसवी किया जाता है और उसी प्रकार बदला जाता है। इसकी वजह से आवाज धीमी और तेज सुनाई देती है।
आमतौर पर लाउडस्पीकर के अंदर एक चुंबक लगा होता है। इस चुंबक के चारों ओर एक पतली परत की जाली लगी होती है। इलेक्ट्रिकल तरंगों के चुंबक से टकराने से वाइब्रेशन पैदा होता है। इससे जाली हिलती है और एमप्लीफाई कर आवाज को बाहर भेजता है।