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अमेरिका: करीब 70 साल बाद किसी महिला को दी गई सजा-ए-मौत

Thu, 14 Jan 2021 10:43 AM IST
योगेश जोशी फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश जोशी Updated Thu, 14 Jan 2021 10:43 AM IST
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lisa montgomery case america us executes woman death row convict in m capital punishment in americaurder case
लीसा मॉन्टगोमरी - फोटो : सोशल मीडिया

अमेरिका में लगभग 70 साल बाद, पहली बार किसी महिला कैदी को मौत की सजा दी गई है। 52 वर्षीय लीसा मॉन्टगोमरी को साल 2007 में 'एक जघन्य अपराध' के मामले में दोषी पाया गया था और इस मामले में केंद्रीय अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी।

बुधवार को उन्हें अमेरिका के इंडियाना प्रांत की एक जेल में जहर का इंजेक्शन दिया गया। इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाने की अपील को खारिज कर दिया था। इस केस ने लोगों का ध्यान अपनी ओर इसलिए भी आकर्षित किया क्योंकि लीसा के वकील ने अदालत में यह दलील दी थी कि 'उनकी मुवक्किल की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रही है।'एक चश्मदीद के अनुसार, सजा से पहले जब मॉन्टगोमरी के चेहरे से मास्क उतारा गया और उनसे पूछा गया कि 'क्या मरने से पहले उन्हें कुछ कहना है?' तो उन्होंने 'ना' के अलावा कुछ नहीं कहा।

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लीसा मॉन्टगोमरी - फोटो : सोशल मीडिया

मॉन्टगोमरी की वकील कैले हेनरी ने उनकी मौत के बाद कहा कि 'लीसा को न्याय नहीं मिला, उन्हें सजा देने में जो भी लोग शामिल रहे, उन्हें शर्म आनी चाहिए कि वो एक टूटी हुई और तकलीफों से घिरी रही महिला की सजा को रोक नहीं पाए।' न्याय विभाग के मुताबिक, लीसा की सजा को दो बार स्थगित किया गया जिसमें कोरोना महामारी एक बड़ी वजह रही। लीसा ने साल 2004 में अमेरिका के मिसोरी राज्य की एक गर्भवती महिला की गला घोंटकर हत्या कर दी थी और उसके बाद मृत महिला का पेट चीरकर लीसा ने उसके बच्चे का अपहरण कर लिया था।

लीसा से पहले, अमेरिकी सरकार ने साल 1953 में ऐसी सजा दी थी। अमेरिका में मौत की सजा का रिकॉर्ड रखने वाले केंद्र (डीपीआई सेंटर) के मुताबिक, 1953 में मिसोरी राज्य की बोनी हेडी को गैस चेंबर में रखकर मौत की सजा दी गई थी।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

दिसंबर 2004 में लीसा मॉन्टगोमरी की बॉबी जो स्टिन्नेट से बात हुई थी। लीसा एक पिल्ला खरीदना चाहती थीं। न्याय विभाग की प्रेस रिलीज के अनुसार, इसके लिए लीसा कैनसस से मिसोरी गईं, जहां बॉबी रहती थीं। बॉबी के घर में घुसने के बाद लीसा ने उन पर हमला किया और गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी। जिस वक्त यह घटना हुई, तब बॉबी आठ महीने की गर्भवती थीं।सरकारी प्रेस रिलीज के अनुसार, इसके बाद लीसा मॉन्टगोमरी ने बॉबी के पेट पर चाकू की मदद चीरा लगाया और बॉबी के बच्चे को उनसे अलग किया और उसका अपहरण कर लिया। न्याय विभाग ने यह भी बताया था कि लीसा ने कुछ वक्त तक यह जताने की कोशिश भी की थी कि बच्चा उन्हीं का है।

साल 2007 में, एक जूरी ने लीसा को हत्या और अपहरण का दोषी पाया और सर्वसम्मति से उन्हें मौत की सजा दिए जाने की सिफारिश की। लेकिन मॉन्टगोमरी के वकील यह दलील देते रहे कि 'बचपन में लीसा मॉन्टगोमरी को बहुत ज्यादा पीटा गया, उनका उत्पीड़न हुआ जिससे उनके मस्तिष्क को क्षति पहुंची, वो मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, इसलिए उन्हें मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिए।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • अमेरिका में सजा दिए जाने का अंतर

अमेरिकी न्याय प्रणाली के तहत, अभियुक्तों के खिलाफ या तो राष्ट्रीय स्तर पर संघीय अदालतों में मुकदमे चलाए जा सकते हैं, या फिर क्षेत्रीय स्तर की राज्य अदालतों में। कुछ अपराध, जैसे जाली मुद्रा के मामले, ईमेल चोरी आदि अपने आप ही संघीय स्तर की अदालतों के दायरे में आते हैं जिसमें या तो अमेरिकी सरकार पक्षकार होती है, या वो लोग पक्षकार होते हैं जिनके संवैधानिक अधिकारों का हनन किया गया हो।

इसके अलावा, कौन से मामले संघीय अदालतों में दायर किए जाएंगे, यह अपराध की जघन्यता पर निर्भर करता है। 1972 के एक निर्णय में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सभी मौजूदा मृत्युदण्ड कानूनों को रद्द कर दिया था, जिसके प्रभाव से सभी अपराधियों की मौत की सजा रद्द हो गई थी।

1976 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य आदेश के बाद राज्यों को मौत की सजा देने की ताकत वापस मिली और 1988 में अमेरिकी सरकार ने एक कानून पारित किया जिसके आधार पर संघीय अदालतों को भी मृत्युदंड देने का अधिकार वापस मिल गया।डीपीआई सेंटर के अनुसार, 1988 से 2018 के बीच संघीय अदालतों ने विभिन्न मामलों में कुल 78 लोगों को मौत की सजा सुनाई जिनमें से केवल तीन लोगों को ही मौत की सजा दी जा सकी।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
  • मृत्युदंड के नियमों में बदलाव क्यों?

ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल कहा था कि लंबे अंतराल के बाद उनकी सरकार संघीय अदालतों में मृत्युदंड को फिर से शुरू करेगी। उस समय एक बयान में, अटॉर्नी जनरल ने कहा था, "दोनों पार्टियों की सरकार के तहत, न्याय विभाग सबसे खराब अपराधियों के खिलाफ मौत की सजा की मांग करता रहा है। न्याय विभाग 'कानून के शासन' को मानता है और उसी हिसाब से चलता है। हमें चाहिए कि हम दोषियों को सजा दिला पाएं ताकि पीड़ितों और उनके परिवारों का हमारी न्याय प्रणाली में विश्वास कायम रहे।"

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