वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के खिलाफ जंग छेड़ते हुए देश में रविवार से टीका उत्सव की शुरुआत की गई। ये टीका उत्सव 14 अप्रैल तक चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि इस खास मौके पर ज्यादा से ज्यादा लोग टीका लगवाएं। हालांकि, टीकाकरण के शुरू होने के बाद भी बहुत से लोग कई तरह के डर के वजह से वैक्सीन लेने से झिझक रहे हैं। आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि दुनिया में पहला टीका आने पर लोग कितना डरे हुए रहे होंगे।
टीका उत्सव: वैक्सीन के शुरुआती ट्रायल से डरते थे लोग, कैदियों को इंजेक्शन देकर किया गया प्रयोग
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कोरोना वायरस के आने से पहले भी दुनिया में कई तरह की महामारियों का फैलने का जिक्र मिलता है। हैजा, चेचक, प्लेग, रेबीज, टीबी और पोलियो समेत कई बीमारियों के कारण लाखों-करोड़ों लोगों की जानें गईं। लेकिन विकसित मेडिकल व्यस्था नहीं होने के कारण लोगों को सही इलाज नहीं मिल पाता था। ऐसे में डॉक्टर अपने हिसाब से इलाज करते थे, जिसके कारण लोगों की जान चली जाती थी।
मेडिकल साइंस की तरक्की होने से वैज्ञानिकों को ये बात समझ में आया कि किसी भी बीमारियों से बचने के लिए टीका काफी प्रभावी हो सकता है। ऐसा माना जाता है कि चेचक दुनिया की ऐसी पहली बीमारी थी जिसके टीके की खोज हुई। चेचक के टीके की खोज साल 1976 में अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने किया था। आज के समय में भले ही लोग चेचक रोग को सामान्य मानते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब ये बीमारी काफी गंभीर थी। सत्तर के दशक में इस बीमारी का डर खत्म हुआ। चेचक के वजह से दुनियाभर में करीब 50 करोड़ लोगों की जान चली गई थी।
टीका की खोज के बाद इसका ट्रायल करना काफी मुश्किल था। क्योंकि लोग टीका लेने और टीकाकरण के ट्रायल में शामिल होने से डरते थे। किसी भी वैक्सीन को बनाने और लैब टेस्ट में सफल होने के बाद ह्यूमन ट्रायल एक अहम पड़ाव होता है। लेकिन लोग तो ट्रायल में भाग लेना ही नहीं चाहते थे। ऐसे में वैज्ञानिकों ने ट्रायल के लिए एक अलग तरीका निकाला।
कैदियों पर होते थे प्रयोग
वैज्ञानिकों ने टीके के ट्रायल के लिए डिटेंशन कैंपों में रहने वाले लोगों को जबरदस्ती हिस्सा बनाने लगे। कहीं गैस मास्क लगाकर फ्लू के वायरस डाले जाते, तो कहीं इंजेक्शन के जरिए बीमारियों के वायरस शरीर में डाल दिए जाते थे। यहां तक कि हेपेटाइटिस की बीमारी के मरीजों से रक्त लेकर उसे स्वस्थ कैदियों में डाल दिया गया और फिर उन पर प्रयोग हुआ। सबसे हैरान करने वाली बात ये रही कि प्रयोग के दौरान मरने वाले कैदियों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था।