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ISS: अंतरिक्ष में फंसीं सुनीता विलियम्स! जानिए स्पेस स्टेशन की रोचक बातें, एक दिन में होता है 16 सूर्योदय

Wed, 10 Jul 2024 01:02 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: धर्मेंद्र सिंह Updated Wed, 10 Jul 2024 01:02 PM IST
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international space station interesting facts about iss sunita williams nasa astronaut
जानिए स्पेस स्टेशन से जुड़ी रोचक बातें - फोटो : PTI

ISS: अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और अपने साथी बैरी विल्मोर के साथ स्पेस में फंस गई हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाले बोइंग स्टारलाइनर में खराबी के कारण दोनों अंतरिक्ष यात्री वापस नहीं आ पाए हैं। अंतरिक्ष यात्रियों का यह मिशन सिर्फ आठ दिनों का ही था। पांच जून को अंतरिक्ष यान ने उन्हें लेकर उड़ान भरा था। बोइंग स्टारलाइनर ने यह पहली उड़ान भरी थी। हीलियम लीक और थ्रस्टर में खराबी के कारण उनकी वापसी को टाल दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में सुनीता विलियम्स अभी भी हैं। नासा के मुताबिक, वह पूरी तरह से सुरक्षित हैं। 



कैसा है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन?

स्पेस में स्थित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन एक घर की तरह है। इसमें पांच बेडरूम, दो बाथरूम, एक जिम और एक खिड़की भी है। अगर अंतरिक्ष स्टेशन में लगे सोलर पैनल के किनारों से मापा जाए, तो यह एक फुटबाॅल मैदान के बराबर है। अंतरिक्ष स्टेशन पर छह लोग रह सकते हैं, लेकिन कई बार इसकी संख्या अधिक हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मई 2022 तक 20 देशों के 258 अंतरिक्ष यात्री जा चुके हैं। इनमें सबसे अधिक अमेरिका के 158 और रूस के 54 अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं। यह पृथ्वी से करीब 400 किमी ऊपर है। यह 28, 000 किमी की रफ्तार से धरती के चारों तरफ घूमता है। 90 मिनट में अंतरिक्ष स्टेशन धरती का एक चक्कर पूरा करता है। इसका मतलब यह है कि एक दिन में अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष स्टेशन में 16 सूर्योदय और 16 सूर्यास्त देखते हैं। 

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जानिए स्पेस स्टेशन से जुड़ी रोचक बातें - फोटो : NASA

इस देश ने सबसे पहले बनाया था अतंरिक्ष में स्पेस स्टेशन 

20 जुलाई 1967 को अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्म्सट्रॉन्ग ने चांद की जमीन पर कदम रखा था। अंतरिक्ष की इस दौड़ में रूस बहुत पीछे रह गया था। इसके बाद अमेरिका पर बढ़त हासिल करने के लिए रूस ने पृथ्वी की निचली कक्षा धरती से करीब 400 किमी दूर अंतरिक्ष में 19 अप्रैल को 1971 को दुनिया का पहला सल्यूट-1 अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया। अंतरिक्ष यात्री यहां पर रहकर शोध करते थे। 

सोवियत ने सोयुज 11 अंतरिक्ष यान से तीन अंतरिक्ष यात्री भेजे थे और वे वहां पर 21 दिन रहे। वापस आते वक्त अंतरिक्ष यान में खराबी आ गई और तीनों अतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई। इसके बाद अमेरिका ने भी अपना पहला अंतरिक्ष स्टेशन 14 मई 1973 को लाॅन्च किया। फिर रूस ने 20 फरवरी 1986 तो अपना पहला स्थायी स्पेस स्टेशन मीर (MIR) स्थापित किया। इसके बाद नासा ने कनाडा, जापान और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण किया। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को बनाने में रूस भी शामिल है। 

 

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जानिए स्पेस स्टेशन से जुड़ी रोचक बातें - फोटो : NASA

अतंरिक्ष स्टेशन में इंसान की धीरे बढ़ती है उम्र 

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों की उम्र धरती की तुलना में कम तेजी से बढ़ती है। यूरोपियन अंतिरक्ष एजेंसी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर यात्रियों के समय का बहाव अलग होता है। विज्ञान की भाषा में इसे टाइम डिलेशन कहा जाता है। इसकी वजह से कोई शख्स अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 16 साल तक रहता है, तो उसकी उम्र धरती के लोगों की उम्र से एक सेकेंड कम रहती है। 

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जानिए स्पेस स्टेशन से जुड़ी रोचक बातें - फोटो : NASA

अंतरिक्ष में रहने वाले यात्रियों पर क्या होता है असर 

अंतरिक्ष में वातावरण पृथ्वी से अलग होता है। वहां पर माइक्रोग्रैविटी, रेडिएशन का खतरा, अंतरिक्ष स्टेशनों के सीमित क्वार्टर मानव स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती है। अंतरिक्ष स्टेशन पर ज्यादा समय तक रुकना उनके लिए जोखिम भरा है। अंतरिक्ष यात्रियों के लिए स्पेस में तात्कालिक परिवर्तनों में एक द्रव पुनर्वितरण है। गुरुत्वाकर्षण न होने की वजह से शारीरिक तरल पदार्थ शरीर के ऊपर वाले भाग पहुंचने लगते हैं। इसकी वजह से चेहरे पर सूजन, नाक बंद होना और पैरों में तरल पदार्थ की कमी होने लगती है। इससे रक्त की मात्रा कम होने का खतरा रहता है और  ब्लड प्रेशर में गड़बड़ी हो सकती है।

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जानिए स्पेस स्टेशन से जुड़ी रोचक बातें - फोटो : NASA

क्या होती है समस्या? 

धरती पर लौटने पर इसका असर नजर आता है। कुछ समय तक खड़े होने पर अंतरिक्ष यात्रियों को चक्कर आने लगता है और बेहोश हो जाते हैं। अंतरिक्ष में जाने वाले हर यात्री के साथ इस तरह की समस्या होती है। माइक्रोग्रैविटी का मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण की कमी की वजह से अंतरिक्ष यात्रियों की मांशपेशियां पैरों और पीठ में विशेष तौर पर कमजोरी आती है। इसके कारण हड्डियों को नुकसान होता है। विशेष तौर पर रीढ़ और श्रोणि जैसी वजन उठाने वाली हड्डियों में। यांत्रिक तनाव की कमी के कारण ऑस्टियोपोरोसिस के समान हड्डियों के घनत्व में कमी आती है।

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