एक समय ऐसा था, जब हफ्ता ना ही सोमवार से शुरू होता था और ना ही रविवार से। आप हफ्ते की शुरूआत या अंत कहीं से भी कहीं पर भी मान सकते थे। क्योंकि कामकाजी लोगों को हर दिन काम करना होता था। किसी भी तरह की साप्ताहिक अवकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी। हालांकि, आज के समय में हफ्ते में रविवार की छुट्टी तो सबसे कॉमन बात है ही, कई जगह तो अब वर्किंग वीक पांच दिनों का हो गया है। लेकिन क्या आपको यह बात पता है कि भारत में संडे की छुट्टी कब और क्यों मिलना शुरू हुई?
मुफ्त में नहीं मिला था देश को 'रविवार का साप्ताहिक अवकाश', कई सालों के आंदोलन के बाद हासिल हुई थी यह छुट्टी
इसके पीछे का इतिहास जानना बहुत जरूरी है। कई लोगों की कठिन लड़ाई और संघर्ष के बाद ही ऐसा संभव हो पाया है। रविवार के दिन लोग अपने घरों में बैठकर आराम फरमाते हैं। इसका पूरा श्रेय नारायण मेघाजी लोखंडे को जाता है। ब्रिटिश शासनकाल में लोगों को बहुत परेशान किया जाता था। उस समय किसी भी मजदूर को कोई छुट्टी नहीं मिलती थी और सप्ताह के सातों दिन सबको काम करना पड़ता था।
उस समय नारायण मेघाजी लोखंडे श्रमिकों के नेता थे। श्रमिकों की हालत को देखते हुए उन्होंने ब्रिटिश सरकार को इस बारे में सूचित किया। इसके साथ ही हफ्ते में एक दिन छुट्टी देने की बात कही, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनके इस निवेदन को सिरे से खारिज कर दिया था।
लोखंडे जी को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने सभी श्रमिकों को अपने साथ लिया और इसका जमकर विरोध किया और सरकार की इस सख्ती के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। मजदूरों को उनका हक दिलवाने के लिए काफी कुछ किया। 'बॉम्बे हैंड्स एसोसिएशन' के जरिये लोखंडे जी ने 1881 में पहली बार कारखाने संबंधी अधिनियम में बदलावों की मांग रखी और इसे पूरा करवाने के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई।
मजदूरों की मांगों के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसमें ये चीजें शामिल थी -
- मजदूरों के लिए रविवार के अवकाश हो।
- भोजन करने के लिए काम के बीच में समय मिले।
- काम के घंटे यानी शिफ्ट का एक समय निश्चित हो।
- काम के समय दुर्घटना की स्थिति में कामगार को वेतन के साथ छुट्टी मिले।
- दुर्घटना में मज़दूर की मौत की स्थिति में उसके आश्रितों को पेंशन मिले।