Durga Puja: छपरा में 103 वर्षों से लगातार बंगाली रीति रिवाज से हो रहा सिंदूर खेला, खोइछा भरकर माता की विदाई
Durga Puja: छपरा में 103 वर्षों से लगातार बंगाली रीति रिवाज से हो रहा सिंदूर खेला, खोइछा भरकर माता की विदाई
Durga Puja: Bengali community women bid farewell to Goddess by donating vermilion, filling khoicha in Chhapra
परंपरागत विदाई की विधि
कालीबाड़ी में हर साल माता की स्थापना और पूजा विधिपूर्वक होती है। इस वर्ष भी माता का पूजन और हवन करने के बाद बुजुर्ग महिलाओं ने माता को सिंदूर लगाया और उनके आंचल में खोईचा डालकर विदाई दी। यह मान्यता है कि इस रस्म को निभाने से पति की उम्र लंबी होती है।
बंगाली समाज की परंपरा के अनुसार, विजयादशमी के दिन जहां अन्य स्थानों पर माता की विदाई होती है, वहीं छपरा के कालीबाड़ी में एकादशी के दिन विशेष रूप से सिंदूर खेला का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर महिलाओं ने मिलकर माता को सिंदूर से रंगा और उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की।
उल्लू ध्वनि और आनंद
सिंदूर खेला के दौरान महिलाएं एक विशेष प्रकार की आवाज निकालती हैं, जिसे उलू कहा जाता है। यह ध्वनि प्रत्येक शुभ अवसर पर की जाती है। इस बार भी जब माता की विदाई का समय आया, तो सभी महिलाएं उल्लू की ध्वनि निकालते हुए एक-दूसरे को सिंदूर लगाती रहीं।
मिठाई के साथ विदाई
इस सांस्कृतिक अनुष्ठान में महिलाओं ने माता को मिठाई खिलाने के बाद नम आंखों से विदाई दी। सभी ने मिलकर मां दुर्गा से आग्रह किया कि वह अगले वर्ष पुनः उनके बीच आएं। यह आयोजन न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी।
पूजा की विशेषताएं
कालीबाड़ी में होने वाली यह पूजा पूरी तरह से बंगाली रीति रिवाजों के अनुसार होती है। यहां आने वाले ब्राह्मण भी बंगाल से आते हैं और पूजा अर्चना के लिए यहीं रहते हैं। इस साल के आयोजन में शामिल होने वाली महिलाएं एकत्रित होकर मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त करने में पीछे नहीं रहीं। साल भर की तैयारी के बाद, एकादशी के दिन माता दुर्गा का विसर्जन किया जाता है। इस प्रकार, यह परंपरा न केवल धार्मिक मान्यता का प्रतीक है, बल्कि सामुदायिक भावना को भी बढ़ावा देती है।