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Chhath Puja: बिहार में त्रेता युग से है यह मंदिर, कई बार बर्बाद होकर जिंदा हुआ; छठ में इस स्थान का विशेष महत्व

Tue, 05 Nov 2024 06:58 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Tue, 05 Nov 2024 06:58 PM IST
सार

Dev Surya Temple: देव सूर्य मंदिर का निर्माण त्रेता युग में राजा ऐल ने करवाया था, जो आज से लगभग एक लाख पचास हजार चौबीस वर्ष पुराना माना जाता है। छठ पर्व के दौरान देव सूर्य मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। कार्तिक महीने के इस महापर्व में सूर्योपासना करने हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं।

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Chhath Puja: Draupadi had offered prayers to Lord Surya in Dev Surya Temple, huge fair is organized on Chhath
छठ पर्व पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़ - फोटो : अमर उजाला
बिहार के लोक आस्था के महापर्व छठ के दौरान जब सूर्योपासना अपने चरम पर होती है, औरंगाबाद का देव सूर्य मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक खास आकर्षण बन जाता है। यह प्राचीन मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक, पौराणिक और स्थापत्य के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसके निर्माण का वर्णन न केवल पुराणों में मिलता है, बल्कि कई पुरातत्वविद, चित्रकार और विद्वान इस मंदिर को प्राचीन काल का एक अद्भुत साक्ष्य मानते हैं।

 
मंदिर अति प्राचीन, तथ्य अनेक
देव सूर्य मंदिर के अति प्राचीन होने को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य गौर करने लायक है। पंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी इस मंदिर को प्राचीन माना है, लेकिन वे इसे प्राचीनकाल में बुद्ध मंदिर मानते हैं, जिसे विधर्मियों से भयाक्रांत भक्तजनों ने मिट्टी से पाट दिया था। कहा जाता है कि सनातन धर्म के संरक्षक और संस्कारक शंकराचार्य जब इधर आए तो उन्होंने संशोधित और सुसंस्कृत कर यहां मूर्तियां प्रतिष्ठित की। पुरातत्व से जुड़े डॉ. केके दत्त और पंडित विश्वनाथ शास्त्री ने भी इस मंदिर की अति प्राचीनता का प्रबल समर्थन किया है।
 
 
Chhath Puja: Draupadi had offered prayers to Lord Surya in Dev Surya Temple, huge fair is organized on Chhath
देव सूर्य मंदिर - फोटो : अमर उजाला

पौराणिक कथा- श्वेत कुष्ठ से मुक्ति और मंदिर का निर्माण
जनश्रुति के अनुसार, देव सूर्य मंदिर का निर्माण राजा ऐल ने करवाया था। कथा है कि राजा ऐल, जो एक समय श्वेत कुष्ठ रोग से पीड़ित थे, देव के वनप्रांतर में एक सरोवर के जल के संपर्क में आकर रोग मुक्त हो गए। इस चमत्कारिक घटना के बाद, उन्होंने रात को स्वप्न में भगवान भास्कर से मंदिर निर्माण और मूर्ति प्रतिष्ठा का निर्देश प्राप्त किया। राजा ऐल ने उसी निर्देश के अनुसार, सरोवर से मूर्ति को निकालकर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जिसे आज हम देव सूर्य मंदिर के रूप में जानते हैं।
 
देवशिल्पी विश्वकर्मा का अद्भुत निर्माण
इस मंदिर के निर्माण को लेकर यह भी मान्यता है कि इसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक ही रात में अपने हाथों से किया था। इसके अद्भुत शिल्प और वास्तुकला से ऐसा प्रतीत होता है जैसे इसे किसी सामान्य शिल्पकार ने नहीं, बल्कि स्वयं देवताओं ने निर्मित किया हो। बिना किसी सीमेंट या चूने का उपयोग किए, विभिन्न आकारों के पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर भारत में स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है।
 

Chhath Puja: Draupadi had offered prayers to Lord Surya in Dev Surya Temple, huge fair is organized on Chhath
देव सूर्य मंदिर - फोटो : अमर उजाला

पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर- एक दुर्लभ स्थापत्य चमत्कार
देश में जहां अधिकतर सूर्य मंदिर पूर्वाभिमुख होते हैं ताकि उगते सूर्य की किरणें सीधे मूर्ति पर पड़ें, देव का सूर्य मंदिर इसका अपवाद है। यह सूर्य मंदिर पश्चिमाभिमुख है और इसकी दिशा के बदलने से जुड़ी एक कथा प्रसिद्ध है। कहते हैं कि बर्बर लुटेरा काला पहाड़ जब मंदिर को तोड़ने आया, तब पुजारियों ने प्रार्थना की कि मंदिर का मुख पश्चिम की ओर हो जाए। चमत्कारिक रूप से, अगली सुबह मंदिर पश्चिमाभिमुख पाया गया और तब से यह पश्चिम की ओर ही स्थित है।
 

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देव सूर्य मंदिर - फोटो : अमर उजाला

यूरोपियन चित्रकारों की नजर में देव मंदिर
1790 में थॉमस और विलियम डेनियल नामक यूरोपीय चित्रकारों ने भारत भ्रमण के दौरान देव सूर्य मंदिर की पेंटिंग बनाई थी। उनके चित्र में मंदिर नागर शैली में वर्तमान स्वरूप में ही दिखता है, जिसमें दो शिवलिंग और ताड़ के पेड़ भी नजर आते हैं। यह चित्र मंदिर की प्राचीनता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। थॉमस और विलियम डेनियल ने अपने यात्रा संस्मरण 'ओरियंटल सीनरी' में देव मंदिर को भी दर्ज किया है, जो इसकी वास्तुकला और स्थापत्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में सहायक बना।

सूर्य मंदिर में दुःखहरनी माई भी
संरचना के दृष्टिकोण से बात करें तो वर्तमान में भी यह मंदिर पेंटिंग की तस्वीर जैसा ही दिखता है, लेकिन अब मंदिर के चारों ओर चहारदीवारी है और अब मंदिर में चहल पहल यानी श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई है। हालांकि इस वक्त भी मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाएं हिस्से में खंडित मूर्तियां विद्यमान है, जिसकी पूजा स्थानीय लोगों द्वारा दु:खहरनी माई कहकर की जाती है।
 

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तीन रूपों में होती है भगवान सूर्य की उपासना - फोटो : अमर उजाला

तीन रूपों में भगवान सूर्य की आराधना
देव सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य की तीन मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में देखा जाता है। वहीं, इन्हें उदयाचल सूर्य (उदय होते सूर्य), मध्याचल सूर्य (मध्य सूर्य) और अस्ताचल सूर्य (अस्त होते सूर्य) के रूप में भी पूजा जाता है। गर्भगृह में भगवान सूर्य की चार फीट की खंडित मूर्ति भी रखी हुई है, जो इस मंदिर की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व को और भी बढ़ाती है।
 
नागर शैली में निर्मित मंदिर का स्थापत्य सौंदर्य
देव सूर्य मंदिर का निर्माण भारतीय मंदिर स्थापत्य की नागर शैली में किया गया है। इस शैली की विशेषता इसमें है कि इसमें एक ऊंचा शिखर, कलश और अमलक होता है। मंदिर की संरचना में पॉलीगोनल कॉलम और अन्य अद्वितीय शिल्पकला के तत्व इसे भारतीय स्थापत्य का एक अद्भुत उदाहरण बनाते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कला प्रेमियों और इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।


 
एक लाख पचास हजार चौबीस वर्ष पुराना मंदिर
मंदिर के बाहर संस्कृत में उत्कीर्ण एक शिलालेख के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में राजा ऐल ने करवाया था, जो आज से लगभग एक लाख पचास हजार चौबीस वर्ष पुराना माना जाता है। यह शिलालेख मंदिर की प्राचीनता और उसकी धार्मिक महत्ता का साक्ष्य है।
 

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