जिस समय पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है उस अवधि को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना क्रांति चक्र कहलाता है। इस परिधि चक्र को बांटकर बारह राशियां बनी हैं। बारह महीने बारह राशियों के लिए हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक वर्ष में दो अयन होते हैं। अयन का अर्थ परिवर्तन से है। अर्थात साल में दो बार सूर्य की स्थिति में परिवर्तन होता है। सूर्य 6 महीने उत्तरायण और 6 महीने दक्षिणायन में रहता है।
जानिए क्या है सूर्य के दक्षिणायन होने का महत्व, कर्क संक्रांति में सूर्य पूजा है बेहद लाभकारी
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दक्षिणायन होने पर सूर्य दक्षिण की ओर झुकाव के साथ गति करता है। दक्षिणायन के दौरान वर्षा, शरद और हेमंत, ये तीन ऋतुएं होती हैं। तामसिक प्रयोगों के लिए दक्षिणायन का समय उपयुक्त होता है। शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इन दिनों में किए गए जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर किया गया दान सौ गुना फल प्रदान करता है।
वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायण को पितृयान कहा जाता था। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएं शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर भी माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्त्व बताते हुए गीता के आठवें अध्याय में कहा है कि उत्तरायण के 6 मास के शुभ काल में जब भगवान भास्कर देव उत्तरायण होते हैं तो पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अन्धकार में शरीर का त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है।
कर्क संक्रांति पर सूर्य की पूजा
ज्योतिष में सूर्य को आत्मा का कारक, प्रतिष्ठा, यश-कीर्ति, राजयोग प्रदान करने वाला, नेत्रों का स्वामी एवं आरोग्य प्रदान करने वाला ग्रह माना गया है। दक्षिणायन के शुरू के चार माह में भगवान विष्णु और शिव का पूजन किए जाने का विधान है। कर्क संक्रांति पर विशेष रूप से सूर्य देव की उपासना की जाती है। विशेष रूप से इस दिन सूर्य भगवान को अर्घ्य देने से सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। सूर्य प्रसन्न होने से पद, मान-सम्मान में वृद्धि करते हैं। कर्क संक्रांति के समय पवित्र नदी में स्नान करें या घर में जल में गंगाजल डालकर स्नान करें।
स्नान के पश्चात ताम्बे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें लाल पुष्प , लाल चन्दन , तिल आदि डालकर ॐ घृणि सूर्याय नमः मन्त्र का जप करते हुए सूर्य को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय आपकी दृष्टि गिरते हुए जल में प्रतिबिंबित सूर्य की किरणों पर होनी चाहिए। भविष्य पुराण के अनुसार सूर्य नारायण का पूजन करने वाला व्यक्ति प्रज्ञा, मेधा तथा सभी समृद्धियों से संपन्न होता हुआ चिरंजीवी होता है। यदि कोई व्यक्ति सूर्य की मानसिक आराधना भी करता है तो वह समस्त व्याधियों से रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए सूर्यदेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए।