महाभारत में महात्मा विदुर एक महत्वपूर्ण पात्र थे। ये ऋषि वेदव्यास के पुत्र थे। विदुर जी बहुत ज्ञानी दूरदर्शी और विद्वान व्यक्ति थे। वेद-वेदांत में परांगत और बुद्धिमान होने पर भी उनका स्वाभाव अत्यंत सरल था। जब भगवान कृष्म महाभारत युद्ध से पहले शांति दूत बनकर आए तो वे महत्मा विदुर के यहां ही ठहरे थे। विदुर सत्य, ज्ञान, साहस निष्पक्ष निर्णय और धर्म परायण होने के लिए जाने जाते हैं। विदुर जी की शिक्षाएं आज के समय में भी मनुष्य को सही रहा पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। विदुर जी ने अपनी नीति में कुछ कार्य ऐसे बताएं हैं जिन्हें करने से बचना चाहिए। जो लोग ये कार्य करते हैं वे मूर्ख कहलाते हैं और अपने जीवन में दुखों को प्राप्त करते हैं। तो चलिए जानते हैं विदुर नीति।
विदुर नीति: इन कार्यों को करने वाला व्यक्ति कहलाता है मूर्ख, हमेशा रहता है दुखी
परं क्षिपति दोषेण वर्त्तमानः स्वयं तथा।
यश्च क्रुध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः॥
इस श्लोक में विदुर जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपनी गलती को दूसरे की गलती बताकर खुद को बुद्धिमान मानता है तथा असमर्थ होते हुए भी क्रोध करता है। वह मनुष्य महामूर्ख कहलाता है।
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ॥
इस श्वलोक में विदुर जी कहते हैं कि जो व्यक्ति शत्रुओं से मित्रता करता है तथा अपने मित्रों और शुभचिंतकों को स्वयं से दूर कर देता है, मित्रों से ईर्ष्या भाव रखता है। हमेशा बुरे कर्मों में लिप्त रहता है, वह व्यक्ति भी मूर्ख कहलाता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा धोखा खाते हैं और बाद में उन्हें पछताना पड़ता है।
विदुर नीति अनुसार जो मनुष्य दूसरों से ईर्ष्या और घृणा की भावना रखता है, जो मनुष्य हमेशा असंतुष्ट रहता है, अपने कार्य के लिए दूसरों पर आश्रित रहता है और हर बात पर शंका रखता है। ऐसा व्यक्ति मूर्ख कहलाता है। यही कार्य उसके जीवन में दुख का कारण बनते हैं।