Vastu Shastra: भारत में भवन निर्माण सिर्फ एक मकान का ढांचा नहीं होता बल्कि एक धार्मिक कृत्य होता है। चारों पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम और मोक्ष की सिद्धि के रहस्य को जब तक हम नहीं समझेंगे तब तक हम हमारे घर का वास्तु ठीक नहीं कर सकते।
Vastu Shastra: भवन निर्माण की कला के पीछे का धार्मिक रहस्य क्या है? जानें 4 पुरुषार्थ की प्राप्ति कैसे हो?
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धर्म
सबसे पहले हम धर्म की बात करते हैं। जब भी हम किसी भवन का निर्माण करते हैं तो सबसे पहले हमें इस चीज का ध्यान रखना चाहिए कि उस भवन में निवास करने वाले मनुष्यों को आध्यात्मिक और आत्मिक सुख मिलना चाहिए। उस भवन में जिस मुखिया के ऊपर पूरे परिवार की जिम्मेदारी है उसे किसी भी प्रकार का भौतिक कष्ट नहीं होना चाहिए। उस भवन में निवास करने वाले प्राणी ऐसे हो कि उन्हें देखते ही किसी भी मनुष्य का सिर श्रद्धा और विश्वास से उनके चरणों में झुक जाए। उस घर में आपस में उनके झगड़े ना हो,कलह ना हो। हमारे जो प्राचीन ऋषि-मुनियों के आश्रम थे जैसे ही कोई हिंसक प्राणी उनके क्षेत्र में आता था वह अपनी दुश्मनी भूल जाते थे। हमने कई उदाहरणों में पढ़ा भी है कि शेर और बकरी, सांप और नेवला एक साथ हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रम में बैठ करके खेलते थे। यह सिर्फ इसलिए होता था क्योंकि वहां धर्म का निवास था।
अर्थ
अगर अर्थ की बात करें तो जैसे ही व्यक्ति अपने नए मकान का गृह प्रवेश करके उसमें निवास करने लगे उसके धन की वृद्धि होनी चाहिए। वह व्यक्ति जहां भी काम करता है जहां भी अपना व्यवसाय चला रहा है वहां वह निरंतर ऊंचा उठना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि उस व्यक्ति ने जैसे ही मकान बनाया और वह कर्ज में दबता ही चला गया। अगर कोई व्यक्ति नए मकान में प्रवेश करने के बाद अगर आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाए तो यह मान लेना चाहिए कि इस भवन का वास्तु खराब है। इसके विपरीत अगर उसकी आय के स्त्रोत और उसकी साख बढ़ती है,उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है, उसके घर में रहने वाले प्राणियों का सुख और ऐश्वर्य बढ़ता है तो जाहिर सी बात है कि उस भवन निर्माण की सार्थकता सिद्ध होती है।
अब अगर बात करें काम की तो व्यक्ति को अपनी पत्नी का पूर्ण सुख मिलना चाहिए। समय पर उसके पुत्र हो और समय पर उसके पुत्रों का विवाह हो जाए। घर में अच्छी और सुशील उसकी बहू आए। पुत्र-पौत्रों की वृद्धि हो। उसके सुख ऐश्वर्य सांसारिक सुखों में निरंतर वृद्धि हो। कहीं ऐसा ना हो कि उस व्यक्ति के भवन बनाते ही उसके घर में उसके बेटे और बहू के बीच लड़ाइयां शुरू हो जाए, तलाक केस हो जाए, कोर्ट केस हो जाए, संपत्ति का विवाद हो जाए। अगर व्यक्ति भवन में प्रवेश करने के बाद इस प्रकार के पारिवारिक और मानसिक तनाव में अगर जकड़ गया तो यह समझ लीजिए कि उस भवन का वास्तु खराब है। इसके विपरीत अगर उसकी पत्नी उसकी संतति उसके कुटुंबी अगर उसकी आज्ञा में रहते हैं उसका आदर करते हैं तभी भवन की सार्थकता है।
अब आखिर में हम बात करते हैं मोक्ष की, कोई भी व्यक्ति जब अपने भवन में रहे तो उसे एक आध्यात्मिक शांति महसूस होनी चाहिए यानी कि मरणोपरांत उसे मोक्ष की प्राप्ति होनी चाहिए। जो एक अच्छा गृहस्थी होता है वह अपने व्यवहार के कारण न सिर्फ अपने परिवार जनों के बीच बल्कि अपने कुटुम जन, अपने रिश्तेदार, सगे संबंधी, बंधु बांधव, मित्र, अपने गांव में, अपने नगर में अथवा तो अपने राष्ट्र में भी प्रसिद्ध होता है। ऐसा व्यक्ति मरने के बाद सद्गति प्राप्त करता है।
वास्तु शास्त्र इन चारों सिद्धियों को प्राप्त करने में मनुष्य की सहायता करता है इसीलिए भारत एक राष्ट्र है और इस राष्ट्र में जब भी हम भवन बनाते हैं तो उसे हम सिर्फ एक लकड़ी और पत्थरों का ढांचा नहीं कहते बल्कि हम उसे एक आध्यात्मिक निर्माण की तरह देखते हैं।