वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर माह कोई न कोई ग्रह राशि परिवर्तन और अपनी चाल अवश्य ही बदलता है। वैदिक ज्योतिष गणना के अनुसार शनि कुंभ राशि में 05 जून 2022 को वक्री होने जा रहे हैं। सभी ग्रहों में शनिदेव सबसे धीमा चाल से चलने वाले ग्रह हैं, जिसके कारण जिन जातकों के ऊपर शनि का शुभ या अशुभ प्रभाव रहता है काफी दिनों तक रहता है। ज्योतिष में शनि देव को न्यायप्रिय और कर्मफल दाता ग्रह माना गया है। शनि देव 29 अप्रैल 2022 को मकर से कुंभ राशि में करीब ढाई वर्षों के बाद राशि परिवर्तन किया था और करीब 30 वर्षों के बाद दोबारा अपनी स्वराशि कुंभ में गोचर किया है। अब शनिदेव 5 जून 2022 को सुबह करीब 4 बजकर 14 मिनट पर वक्री चाल से चलना आरंभ कर देंगे। शनि की वक्री चाल से सभी 12 राशि के जातकों पर प्रभाव अवश्य ही पड़ेगा। इनमें से कुछ पर अनुकूल तो कुछ के ऊपर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलेगा। ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक नजरिए से शनिदेव का काफी महत्व होता है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को 'न्यायाधीश' और 'कर्मफल दाता' कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। अर्थात जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है। शनि के द्वारा उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं। वहीं इसके विपरीत जो व्यक्ति बुरे मार्ग पर चलता है। शनिदेव उसे दंडित भी करते हैं। ऐसे में आए जानते हैं शनिदेव के बारे में 10 खास बातें।
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Shani Vakri 2022 : 05 जून से शनि की वक्री चाल, जानिए शनिदेव के बारे में 10 खास बातें...
Wed, 01 Jun 2022 04:26 PM IST
विनोद शुक्ला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 01 Jun 2022 04:26 PM IST
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shani dev: जिन जातकों की कुंडली में शनिदेव शुभ भाव में होते हैं उन पर शनिदेव बहुत ही मेहरबान रहते हैं।
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Shani Dev
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1- शनि ग्रह बिना किसी पक्षपात के न्याय करने वाले हैं। यह व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं।
शनिदेव काले क्यों
शनिदेव के पिता का नाम सूर्यदेव और माता का नाम छाया है। छाया भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थीं और वह अपने गर्भ में पल रहे शनि की चिंता किए बगैर हमेशा भगवान शिव की तपस्या में लीन रहती थीं। इस कारण से ना तो वह खुद अपना और ना ही गर्भ में पल रहे अपने बच्चे का ध्यान रख पाती थीं। जिसके कारण से शनि काले और कुपोषित पैदा हुए।
शनिदेव काले क्यों
शनिदेव के पिता का नाम सूर्यदेव और माता का नाम छाया है। छाया भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थीं और वह अपने गर्भ में पल रहे शनि की चिंता किए बगैर हमेशा भगवान शिव की तपस्या में लीन रहती थीं। इस कारण से ना तो वह खुद अपना और ना ही गर्भ में पल रहे अपने बच्चे का ध्यान रख पाती थीं। जिसके कारण से शनि काले और कुपोषित पैदा हुए।
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2 - शनिदेव कुंडली में कर्म भाव के स्वामी हैं। यह उन लोगों के लिए शुभ फलकारी हैं जो अपने कार्यक्षेत्र में मेहनत करते हैं।
बच्चों पर क्यों नहीं पड़ती शनि छाया
12 साल तक के बच्चों पर शनि का प्रकोप कभी नहीं रहता है। इसके पीछे पिप्पलाद और शनि के बीच हुए युद्ध का कारण है। पिप्पलाद ने युद्ध में शनि को परास्त कर दिया और इस शर्त पर छोड़ा कि वे 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देंगे।
बच्चों पर क्यों नहीं पड़ती शनि छाया
12 साल तक के बच्चों पर शनि का प्रकोप कभी नहीं रहता है। इसके पीछे पिप्पलाद और शनि के बीच हुए युद्ध का कारण है। पिप्पलाद ने युद्ध में शनि को परास्त कर दिया और इस शर्त पर छोड़ा कि वे 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देंगे।
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3 - शनिदेव सूर्यदेव और माता छाया की संतान हैं। यमराज इनके भाई और यमुना इनकी बहन हैं।
सभी ग्रहों में श्रेष्ठ शनि
शनिदेव सभी नौ ग्रहों में सबसे श्रेष्ठ होने का भगवान शिव से आशीर्वाद मिला है। इनकी दृष्टि से मनुष्य क्या देवता भी भयभीत रहते हैं।
सभी ग्रहों में श्रेष्ठ शनि
शनिदेव सभी नौ ग्रहों में सबसे श्रेष्ठ होने का भगवान शिव से आशीर्वाद मिला है। इनकी दृष्टि से मनुष्य क्या देवता भी भयभीत रहते हैं।
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4- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन जातको के ऊपर शनिदेव की अशुभ छाया रहती है ऐसे में शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए हर शनिवार सरसों के तेल का दान करना चाहिए।
शनिदेव लंगड़े क्यों
भगवान शनि के धीमी चाल और लंगड़ा कर चलने के पीछे पिप्पलाद मुनि के कोप का ही कारण है। पिप्लाद मुनि अपने पिता की मृत्यु का कारण शनिदेव को मानते थे। पिप्पलाद मुनि ने शनि पर ब्रह्रादण्ड से प्रहार किया। शनि यह प्रहार सहन करने में असमर्थ थे जिस कारण से शनि तीनों लोकों में दौड़ने लगे। इसके बाद ब्रह्रादण्ड ने उन्हें लंगड़ा कर दिया।
शनिदेव लंगड़े क्यों
भगवान शनि के धीमी चाल और लंगड़ा कर चलने के पीछे पिप्पलाद मुनि के कोप का ही कारण है। पिप्लाद मुनि अपने पिता की मृत्यु का कारण शनिदेव को मानते थे। पिप्पलाद मुनि ने शनि पर ब्रह्रादण्ड से प्रहार किया। शनि यह प्रहार सहन करने में असमर्थ थे जिस कारण से शनि तीनों लोकों में दौड़ने लगे। इसके बाद ब्रह्रादण्ड ने उन्हें लंगड़ा कर दिया।