Pitru Paksha 2025: भगवान विष्णु कहते हैं कि ‘यान्ति देवव्रता देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।’ अर्थात- देवताओं को पूजने वाले देव लोकों को, पितरों को पूजने वाले पितृ लोकों को, भूतों को पूजने वाले प्रेत लोकों को और मेरा पूजन करने वाले मुझको ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मांड के अन्य पितृ लोक भी मेरे ही अंशभूत हैं। अत: मैं ही सभी प्राणियों का पापहरण करने वाला पितृ हूं। वेदों के अनुसार, स्वयं नारायण ही पितृ हैं। वास्तव में, श्राद्ध करके हम परोक्ष रूप में नारायण की ही पूजा करते हैं।
Pitru Paksha: श्राद्ध-तर्पण करने से मिलता है नारायण का आशीर्वाद, जानें इसका महत्व
श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है। यह संपूर्ण जगत श्रद्धामय ही है। श्रद्धा के बिना किया गया कार्य सफल नहीं होता, इसलिए मानव को श्रद्धा संपन्न होना चाहिए।
सबको मिलता है अपना हिस्सा
पितरों के नाम तथा गोत्र ही उनके लिए दिए गए हव्य-कव्य आदि पदार्थों को उन तक ले जाने का माध्यम बनते हैं। अतिशय श्रद्धा तथा भक्ति के साथ मंत्रों का प्रयोग करके श्राद्ध कार्य में जो अन्नादि पदार्थ पितरों को व्यवस्थित रूप से नाम, गोत्र, काल, देश आदि का उच्चारण करके दिए जाते हैं, वे सब पितरों के आहार रूप में परिणत हो जाते हैं और अन्य लोकों अथवा किसी भी योनि में जन्म लेने वाले आपके संबंधी जन को उनकी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त होते हैं।
अपने शुभ कर्मों के अनुसार यदि आपके पिता का जन्म देव योनि में हुआ है तो उनके उद्देश्य से किया गया श्राद्ध-तर्पण, अन्नादि पदार्थ अमृत होकर देव योनि में भी मिलता है।
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इसी प्रकार दैत्य योनि में भोग रूप और पशु योनि में चण रूप में परिणत होकर मिलता है। सर्प योनि में वायु रूप में, राक्षस योनि में मांस रूप में, प्रेत योनि में रक्त रूप में तथा मानव योनि में रति शक्ति, सुंदर स्वादिष्ट भोजन और विपुल संपत्ति के रूप में मिलता है।
अगर आपके माता-पिता कहीं भी मानव योनि में जन्म ले चुके हैं तो आप द्वारा दिया गया श्राद्ध उन्हें इसी जन्म में अन्य भौतिक भोगों के रूप में मिलता रहेगा। यही पितृगण प्रसन्न होकर आपको आयु, पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्यपद दिलाते हैं।
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श्रीराम ने भी किया था तर्पण
प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र के पुत्रों ने इसी श्राद्ध कर्म के महात्म्य से अपने पांच जन्मों के कर्मों से मुक्ति प्राप्त करके विष्णु भगवान के परमपद वैकुंठ को प्राप्त किया था। भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध तर्पण किया था। वर्ष में 96 दिन शास्त्रों ने श्राद्ध के लिए बताए हैं, जिनमें आश्विन कृष्ण पक्ष का महत्व सबसे अधिक बताया गया है। इसलिए श्राद्ध कर्म करके अपने भाग्य को सजाया जा सकता है।
पं. निश्चल शास्त्री