वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह का बहुत अधिक महत्व होता है। शनि मकर और कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। शनि तुला राशि में उच्च के और मेष राशि में नीच के माने जाते हैं। शनि बहुत ही मंद गति की चाल से चलते हैं। शनि एक राशि से दूसरी राशि में जानें के लिए ढ़ाई वर्ष का समय लेते हैं। शनि की दशा साढ़े सात साल की होती है जिसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।
वैदिक ज्योतिष में शनि का क्या है महत्व और जानें इसके शुभ-अशुभ प्रभाव
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शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। शनि न्याय करने वाले ग्रह है। अच्छे कर्म करने वाले जातकों को शनि शुभ फल प्रदान करते हैं जबकि बुरे कर्म करने वाले जातकों पर अपनी तिरछी नजर डालते है। शनि की टेढ़ी नजर पड़ने से उस व्यक्ति के जीवन में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती है। व्यक्ति धीरे-धीरे कंकाल और रोगी होने लगता है। शनि अगर व्यक्ति की कुंडली में उच्च के हो तो वह उसे रंक से राजा बना देते हैं। शनि पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी होते है। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि लग्न भाव में होता है तो सामान्यतः अनुकूल नहीं माना जाता है।
शनि के मंत्रों का नियमित जप करने से जीवन में परेशानियों का बोझ कम हो जाता है।
शनि का वैदिक मंत्र
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्त्रवन्तु न:।।
शनि का तांत्रिक मंत्र
ॐ शं शनैश्चराय नमः।।
शनि का बीज मंत्र
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।।
शनि ग्रह का महत्व
शनि ग्रह की विशेष पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव के पिता सूर्यदेव हैं। शनि का रंग काला होने की वजह से सूर्य देव इन्हें अपना पुत्र नहीं मानते हैं इस कारण से शनि हमेशा अपने पिता से बैर भाव रखते हैं। शनिवार का दिन शनिदेव की उपासना के लिए शुभ होता है। इस दिन उन्हें सरसों का तेल अर्पित किया जाता है।
वर्तमान में शनि मकर राशि में है। ऐसे में धनु, कुंभ और मकर राशि पर शनि की साढ़ेसाती चढ़ी हुई है। जबकि मिथुन और तुला राशि पर शनि की ढैय्या चल रही है। ऐसे में इन पांच राशि वाले जातकों पर कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शनि 11 मई को वक्री चाल चलेंगे। जिस वजह से इन राशियों पर और ज्यादा परेशानियां आ सकती है।