11 मई को शनि ग्रह 142 दिनों के लिए वक्री हो चुका है जिसका असर सभी राशियों पर शुभाशुभ रूप में पड़ेगा। वक्री और गोचर जैसे शब्द ज्योतिष विज्ञान में सुनने को मिलते हैं। कई लोगों को इन शब्दों के मतलब भी नहीं पता होते हैं। जैसे कि ग्रह का वक्री होना क्या होता है? ग्रह गोचर क्या है? आदि। इसलिए आज हम जानेंगे कि ग्रह का वक्री या गोचर होना क्या होता है?
जानें ज्योतिष विज्ञान में क्या है वक्री ग्रह का मतलब और गोचर का अर्थ
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ग्रह का वक्री होना क्या होता है?
वक्री ग्रह से आशय जब कोई भी ग्रह अपनी सामान्य दिशा की बजाए उल्टी दिशा यानि विपरीत दिशा में चले तो इस अवस्था को ग्रह का वक्री होना कहा जाता है। हालांकि सूर्य और चंद्रमा कभी भी वक्री नहीं होते हैं। वहीं राहु-केतु सदैव वक्री चाल चलते हैं।
ग्रह गोचर क्या है?
अपनी सामान्य चाल से ग्रह का राशि परिवर्तन (एक राशि से दूसरी राशि में जाना) गोचर कहलाता है। सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह अपनी गति के अनुसार समय-समय पर राशियां बदलते हैं। किसी व्यक्ति के जीवन में ग्रहों के गोचर का बहुत प्रभाव पड़ता है।
| ग्रह | गोचर की अवधि |
| सूर्य | एक माह |
| चंद्र | लगभग सवा दो दिन |
| मंगल | करीब डेढ़ माह |
| बुध | लगभग 14 दिन |
| बृहस्पति | एक साल |
| शुक्र | लगभग 23 दिन |
| शनि | ढ़ाई साल |
| राहु-केतु | एक से डेढ़ वर्ष |
वक्री और गोचर का प्रभाव
वक्री ग्रह के प्रभाव को लेकर ज्योतिष विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। जैसे ज्योतिष विद्वानों का एक मत है कि वक्री ग्रह अपनी उल्टी चाल के कारण उच्च राशि में नीच का फल देता है तो नीच राशि में उच्च का फल देता है। जबकि एक अन्य मत यह भी है कि वक्री चाल में ग्रह सदैव नकारात्मक परिणाम देता है। वहीं गोचर में ग्रह उच्च राशि में अच्छे और नीच राशि में अशुभ फल देता है।