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बिहार की राजनीति: गांधी का फैसला भी जाति के आगे झुका, ब्रिटिश राज में ही 1937 का जातीय आगाज

Mon, 27 Oct 2025 05:08 AM IST
Rajkishor राजकिशोर
Updated Mon, 27 Oct 2025 05:08 AM IST
सार

महात्मा गांधी के फैसले के उलट श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) विधायक दल के नेता चुने गए और बिहार के दूसरे प्रीमियर बने। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मद्देनजर अमर उजाला अपनी खास सीरीज लाया है। पढ़िए 'मगधराज' नाम की श्रृंखला में पहली कड़ी

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Bihar Politics: The Era of Caste and Gandhi’s Unexpected Decision
साल 1955 : पटना पहुंचे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का स्वागत करते उस समय के बिहार के - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

दावत और बगावत यहां की मिट्टी में है। जातीय विमर्श यहां की सियासी फिजां में। तमाम सियासी नारों की जननी भी बिहार है। भारतीय राजनीति के कई मोड़ भी इसी धरती से निकले। तमाम परिवर्तनों का कारक बनी इस जमीन में एक चीज कभी नहीं बदलती...और वह है जातिवाद। बीते 35 वर्षों की बिहार की राजनीति में गिनती के कुछ वर्षों को छोड़ दें, तो ज्यादातर समय यह लालू कुनबे और नीतीश कुमार के साए में ही सिमटी रही। दौर गठबंधनों का है, और राजनीति गरीब-गुरबा, दलित-पिछड़ा और मुसलमान के इर्द-गिर्द घूम रही है। लेकिन 1990 से पहले बिहार की राजनीति का समीकरण बिल्कुल अलग था। तब कांग्रेस पार्टी का दबदबा था और सत्ता का समर अगड़ी जातियों के कद्दावर नेताओं के बीच सिमटा हुआ था।

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1937 : जब बिहार को प्रीमियर मिला
गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिंदुस्तान और उसके नेताओं के विरोध को देखते हुए 1935 में ब्रिटिश हुकूमत गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 लाई। इसी अधिनियम की बदौलत 1937 में पहली बार तमाम प्रांतों में असेंबली का चुनाव हुआ। बिहार प्रांत में भी कांग्रेस को बहुमत मिला। हालांकि प्रांतीय सरकारों के कामकाज में गवर्नर के रोल को लेकर कांग्रेस संतुष्ट नहीं थी, इसलिए उसने सरकार बनाने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप, मोहम्मद यूनुस की मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी ने सरकार बनाई और जुलाई 1937 तक वे बिहार के पहले प्रीमियर (प्रधानमंत्री) बने रहे। बाद में, जब अंग्रेजों ने गवर्नर जनरल के अनावश्यक दखल न देने का भरोसा दिया, तब कांग्रेस ने फिर से सरकार बनाने का फैसला किया। 
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श्रीबाबू बनाम अनुग्रह बाबू; गांधी की इच्छा का तिरस्कार
अब सबसे बड़ा सवाल था कि बिहार का प्रीमियर कौन बनेगा? तब भी बिहार में जातिवादी राजनीति का बोलबाला था। फर्क बस इतना था कि सत्ता-शासन का संघर्ष अगड़ी जातियों के बीच था। प्रांतीय राजनीति में दो नेता ऐसे थे, जिनका प्रभाव इतना बड़ा था कि तमाम जातियों का गुट इन्हीं दो नेताओं के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था।

श्री कृष्ण सिंह या श्रीबाबू भूमिहार जाति से थे। उन्हें ब्राह्मण गुट का मजबूत समर्थन प्राप्त था। अनुग्रह नारायण सिंह यानी अनुग्रह बाबू क्षत्रिय जाति से थे और इन्हें कायस्थ गुट का समर्थन प्राप्त था।

उस समय कांग्रेस में महात्मा गांधी का वचन ही शासन था। महात्मा गांधी ने तब के दिग्गज कांग्रेसी नेताओं में से एक और बिहार प्रांत से ही आने वाले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने अपनी पसंद के नेता अनुग्रह के नाम पर मुहर लगाने का जिक्र किया था। अनुग्रह चंपारण सत्याग्रह के समय उनके करीब आए थे।


मगधराज श्रृंखला की और खबरें पढ़ें... कांग्रेस विधायक दल के नेता का चुनाव पटना के सदाकत आश्रम में हो रहा था। राजेंद्र प्रसाद ने जब बैठक में गांधी जी की इच्छा बताई, तो सर गणेश दत्त और अन्य नेताओं ने आपत्ति जता दी और सवाल किया कि अनुग्रह नारायण सिंह ही क्यों, श्रीबाबू क्यों नहीं? विधायकों की संख्या के हिसाब से श्रीकृष्ण सिंह का पलड़ा भारी था, जिससे आम सहमति नहीं बन पाई। अनुग्रह नारायण को भारी मन से ही सही, श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर अपना समर्थन देना पड़ा।

इस तरह, महात्मा गांधी के फैसले के उलट श्रीकृष्ण सिंह विधायक दल के नेता चुने गए और बिहार के दूसरे प्रीमियर बने। इस घटना से स्पष्ट है कि आजादी से पहले ही जातीय गोलबंदी इतनी मजबूत थी कि गांधी जैसे राष्ट्रीय नेता का फैसला भी प्रांतीय जातीय समीकरण के आगे झुक गया। यह बिहार में जातिवादी राजनीति का एक औपचारिक आगाज था, जिसने आने वाले दशकों की राजनीति की दिशा तय कर दी।

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