Ujjain News: जानिए क्या है विक्रम संवत, राजस्थान, नेपाल ही नहीं गुजरात में भी शिलालेखों पर मिले इसके प्रमाण
विक्रम संवत, जिसे सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57 में प्रारंभ किया, भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है, जबकि आधिकारिक पंचांग शक संवत है। नेपाल में विक्रम संवत राष्ट्रीय पंचांग है, किंतु भारत में नहीं। इसे राष्ट्रीय मान्यता दिलाने हेतु ऐतिहासिक शोध और अकादमिक प्रयास आवश्यक हैं।
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स्वतंत्रता के पश्चात से ही यह चर्चा का विषय रहा है कि भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग वह क्यों नहीं है, जिसे देश के अधिकांश हिस्सों में मान्यता प्राप्त है। विक्रम संवत, जिसे उज्जयिनी के प्रतापी हिंदू राजा विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57 में विदेशी आक्रांताओं पर विजय की स्मृति में प्रारंभ किया था, आज भी हिंदुओं के तीज-त्यौहार, संस्कार एवं ज्योतिषीय गणनाओं के लिए प्रचलित है। इसके विपरीत, भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय पंचांग शक संवत है, जिसे शक राजा रूद्रदमन ने 58 ईस्वी में भारतीयों पर विजय की स्मृति में प्रारंभ किया था। ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर शक संवत को मान्यता दी गई, किंतु यह विचारणीय है कि इसके प्रामाणिक होने के बावजूद यह जनमानस का पंचांग क्यों नहीं बन पाया?
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अजय बोकिल के अनुसार, शोध पत्रिका ‘अधिगम’ में प्रकाशित प्राचीन इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. शिवकांत त्रिपाठी का मत है कि विक्रम संवत भारत के अनेक संवतों में सर्वाधिक जीवंत एवं प्रचलित रहा है। उत्तर भारत में जन्म से लेकर मृत्यु तक इसका व्यापक उपयोग होता है। डॉ. प्रशांत पुराणिक के अनुसार, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत ही भारत का वास्तविक राष्ट्रीय संवत है। इतिहासकारों का मानना है कि विक्रमादित्य ने शकों को हराकर भारत को विदेशी शासकों से मुक्ति दिलाई थी, और इस विजय के उपलक्ष्य में विक्रम संवत की स्थापना की गई थी। यह संवत चंद्रगति पर आधारित है तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है, जिसे हिंदू नववर्ष का प्रारंभ भी माना जाता है।
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, राजस्थान के बरनाला में मिले एक प्राचीन अभिलेख में विक्रम संवत का उल्लेख प्राप्त हुआ है। भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के अनुसार, उज्जैन के परमार वंश के राजा गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य का जन्म 102 ई.पू. में हुआ था तथा उन्होंने 15 ईस्वी में देहत्याग किया। गुजरात के काठियावाड़ स्थित ओखामंडल में मिले राजा जयकदेव के शिलालेख में विक्रम संवत 794 का उल्लेख है, जो ईस्वी सन 737 के समकक्ष है। इतिहासकार राजबली पांडेय और कैलाशचंद जैन के अनुसार, विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थे, जिन्होंने शकों को पराजित किया। यह पराक्रमी सम्राट भारतीय परंपराओं में न्यायप्रियता एवं धर्मपरायणता के प्रतीक माने जाते हैं।
नेपाल ने 1901 में विक्रम संवत को राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता दी, जबकि भारत में ग्रिगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ केवल शक संवत को आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त है। 1957 में भारत सरकार द्वारा गठित पंचांग सुधार समिति ने चांद्रसौर पंचांग को मान्यता दी तथा 22 मार्च 1879 (शक संवत 1879) से इसे राष्ट्रीय पंचांग के रूप में स्वीकार किया गया। वर्तमान में शक संवत 1945 चल रहा है।
राष्ट्रवादी इतिहासकारों का मत है कि भारत सरकार को विक्रम संवत को राष्ट्रीय पंचांग के रूप में स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि यह न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हिंदू संस्कृति एवं राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी है। विक्रम संवत की कालगणना वैज्ञानिक रूप से प्राचीनतम मानी जाती है, और इसके माध्यम से राष्ट्रीय चेतना एवं न्यायप्रियता की पुनर्प्रतिष्ठा की जा सकती है। अतः आवश्यक है कि इस दिशा में ठोस अकादमिक प्रयास किए जाएं तथा नए ऐतिहासिक शोध एवं विद्वत चर्चा के माध्यम से विक्रम संवत को भारत का आधिकारिक पंचांग घोषित करने की प्रक्रिया को बल दिया जाए।
