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Ujjain News: डॉ. जोशी बोले- कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, यह आत्मरंजन और आराधना का माध्यम होती है
Thu, 28 Nov 2024 10:18 AM IST
उज्जैन ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Thu, 28 Nov 2024 10:18 AM IST
सार
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि वर्तमान तकनीक ने हमें तैयार चित्र, गीत और संगीत बहुत आसानी से उपलब्ध करा दिए हैं। ऐसे में, क्या हमारी रचनात्मकता समाप्त नहीं हो रही है? क्या हम उन अनुभवों और प्रक्रियाओं को भूलते जा रहे हैं, जो हमें सच्चा आनंद दिया करती थीं?
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कलायें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मरंजन और ईश आराधना का माध्यम होती है - डॉ. जोशी
विस्तार
भारत में कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि आत्मरंजन और ईश्वर आराधना का माध्यम भी है। दुर्भाग्यवश, औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति ने हमारे कला के प्रति दृष्टिकोण को विकृत कर दिया है। आज, जो लोग महंगे कपड़े, उत्पाद और उपकरणों की चकाचौंध में फंसे हैं, वे कला से दूर होकर जीवन को तनाव और अस्वस्थता की ओर ले जा रहे हैं। यदि सुबह उठते ही हम मोबाइल पर संदेश पढ़ने लगते हैं तो रात्रि की मीठी निद्रा से मिलने वाली ऊर्जा से वंचित रह जाते हैं। इसी तरह, यदि ईयरफोन लगाकर संगीत सुनते हुए सुबह टहलने जाते हैं तो हम प्रकृति के संगीत- जैसे पक्षियों का चहचहाना, गाय का रंभाना, पत्तों की खड़खड़ाहट और हवा की सरसराहट को अनसुना कर देते हैं। ऐसे में मन की सच्ची शांति और आनंद प्राप्त करना असंभव है।
उक्त विचार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कार्यकारी और अकादमिक प्रमुख डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने व्यक्त किए। वे भारतीय ज्ञानपीठ (माधवनगर) में स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा एवं पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की स्मृति में आयोजित 22वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस पर प्रमुख वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
रचनात्मकता और मानसिक स्वास्थ्य पर कला का प्रभाव
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि वर्तमान तकनीक ने हमें तैयार चित्र, गीत और संगीत बहुत आसानी से उपलब्ध करा दिए हैं। ऐसे में, क्या हमारी रचनात्मकता समाप्त नहीं हो रही है? क्या हम उन अनुभवों और प्रक्रियाओं को भूलते जा रहे हैं, जो हमें सच्चा आनंद दिया करती थीं? यह गंभीर चिंतन का विषय है। उन्होंने कहा कि आज का जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनावश्यक होड़ से भरा हुआ है, जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। परिवार के बीच रहकर हम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, लेकिन व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही तनाव हम पर हावी हो जाता है। उन्होंने कहा, अनावश्यक सुविधाओं के सुख के लिए हमने मानसिक दुख खरीद लिया है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ रंगकर्मी शरद शर्मा ने कहा, कलाएं हमारी तर्कशक्ति और स्मरणशक्ति बढ़ाती हैं। कला के बिना जीवन पशु के समान है। यह हमारी आराधना, प्रेरणा, तपस्या, साधना और आनंद का साधन है। कला हमारे चरित्र को अभिव्यक्त करती है।
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सद्भावना गीतों से शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा प्रस्तुत सद्भावना गीतों से हुई। वरिष्ठ शिक्षाविद दिवाकर नातु, संस्थान प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ और अमृता कुलश्रेष्ठ सहित अन्य पदाधिकारियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कविकुलगुरु डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ को सूतांजलि अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया। इस अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ के सद्भावना सभागृह में आयोजित डिजिटल व्याख्यानमाला को सुनने के लिए वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी प्रेमनारायण नागर, डॉ. जफर महमूद, खुशहाल सिंह वाधवा, डॉ. रफीक नागोरी, कवि अशोक भाटी, पुष्कर बाहिती, राधा साहू, किरण तिवारी, एडवोकेट रशीदुद्दीन, नेहा डेगवेकर, राम प्रसाद साहू, दिनेश जैन, विश्वास शर्मा, सुधीर श्रीवास्तव, के.एन. शर्मा, रमेश चंद्र पांचाल, ललित सिंह राठौड़, मयंक माथुर, दिलीप सिंह परमार, शक्ति सिंह चौधरी समेत पत्रकार, शिक्षक और अन्य बौद्धिकजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भूमिजा सक्सेना ने किया।
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उक्त विचार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के कार्यकारी और अकादमिक प्रमुख डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने व्यक्त किए। वे भारतीय ज्ञानपीठ (माधवनगर) में स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा एवं पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की स्मृति में आयोजित 22वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस पर प्रमुख वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
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रचनात्मकता और मानसिक स्वास्थ्य पर कला का प्रभाव
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि वर्तमान तकनीक ने हमें तैयार चित्र, गीत और संगीत बहुत आसानी से उपलब्ध करा दिए हैं। ऐसे में, क्या हमारी रचनात्मकता समाप्त नहीं हो रही है? क्या हम उन अनुभवों और प्रक्रियाओं को भूलते जा रहे हैं, जो हमें सच्चा आनंद दिया करती थीं? यह गंभीर चिंतन का विषय है। उन्होंने कहा कि आज का जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनावश्यक होड़ से भरा हुआ है, जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। परिवार के बीच रहकर हम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, लेकिन व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही तनाव हम पर हावी हो जाता है। उन्होंने कहा, अनावश्यक सुविधाओं के सुख के लिए हमने मानसिक दुख खरीद लिया है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ रंगकर्मी शरद शर्मा ने कहा, कलाएं हमारी तर्कशक्ति और स्मरणशक्ति बढ़ाती हैं। कला के बिना जीवन पशु के समान है। यह हमारी आराधना, प्रेरणा, तपस्या, साधना और आनंद का साधन है। कला हमारे चरित्र को अभिव्यक्त करती है।
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सद्भावना गीतों से शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा प्रस्तुत सद्भावना गीतों से हुई। वरिष्ठ शिक्षाविद दिवाकर नातु, संस्थान प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ और अमृता कुलश्रेष्ठ सहित अन्य पदाधिकारियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कविकुलगुरु डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ को सूतांजलि अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया। इस अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ के सद्भावना सभागृह में आयोजित डिजिटल व्याख्यानमाला को सुनने के लिए वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी प्रेमनारायण नागर, डॉ. जफर महमूद, खुशहाल सिंह वाधवा, डॉ. रफीक नागोरी, कवि अशोक भाटी, पुष्कर बाहिती, राधा साहू, किरण तिवारी, एडवोकेट रशीदुद्दीन, नेहा डेगवेकर, राम प्रसाद साहू, दिनेश जैन, विश्वास शर्मा, सुधीर श्रीवास्तव, के.एन. शर्मा, रमेश चंद्र पांचाल, ललित सिंह राठौड़, मयंक माथुर, दिलीप सिंह परमार, शक्ति सिंह चौधरी समेत पत्रकार, शिक्षक और अन्य बौद्धिकजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भूमिजा सक्सेना ने किया।

कलायें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मरंजन और ईश आराधना का माध्यम होती है - डॉ. जोशी
