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Ujjain News: अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला, हेगड़े बोले- जब तक हम संस्कृति से जुड़े हैं, कोई हमें हिला नहीं सकता

Wed, 19 Nov 2025 08:11 PM IST
उज्जैन ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: उज्जैन ब्यूरो Updated Wed, 19 Nov 2025 08:11 PM IST
सार

भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित 23वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के तीसरे दिन हार्टफुलनेस रिसर्च सेंटर, मैसूर के निदेशक डॉ. मोहनदास हेगड़े ने कहा कि भारतीय संस्कृति मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है और जीवन के तनावों से उबरने की शक्ति देती है।

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Ujjain News: Dr. Mohandas Hegde addressed the All India Goodwill Lecture Series
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में उपस्थित सदस्य। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह मनुष्य को भीतर से सुदृढ़ बनाती है। आज दुनिया तेजी से बदल रही है, जीवन की रफ्तार बढ़ रही है, तनाव और असंतुलन के कारण भी बढ़ते जा रहे हैं, पर इन सबके बीच यदि कोई तत्व हमें संभाल सकता है तो वह हमारी अपनी संस्कृति है। हमारी परंपराएं बताती हैं कि खुशी बाहर मिलती चीज नहीं है; वह हमारे भीतर से ही उपजती है। उपनिषदों ने बहुत स्पष्ट कहा है कि हर समाधान हमारे अंदर है, और उसे पाने के लिए हमें भीतर देखना पड़ता है। योग इसी भीतर की यात्रा का मार्ग है, जो मन को शांत करता है, विचारों को संतुलित करता है और जीवन को स्थिर करता है। हमारी संस्कृति में प्रणाम जैसी सरल क्रिया तक यह संदेश छिपा है कि हर व्यक्ति के भीतर एक आत्मा है जिसका सम्मान होना चाहिए। जब तक हम संस्कृति से जुड़े हैं, दुनिया की कोई शक्ति हमें हिला नहीं सकती। उक्त विचार हार्टफुलनेस रिसर्च सेंटर, मैसूर के निदेशक डॉ. मोहनदास हेगड़े ने स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की स्मृति में भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित 23वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के तीसरे दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए।
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कार्यक्रम की शुरुआत सद्भावना एवं देशभक्ति गीत से हुई। दीप प्रज्ज्वलन तुलसीदास परोहा, विष्णु कुमार शर्मा, डॉ. पिलकेंद्र सिंह अरोरा, डॉ. उर्मी शर्मा, अमृता कुलश्रेष्ठ, आचार्य श्रीराम दवे द्वारा किया गया। अतिथि स्वागत  संस्था प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, अनिल पांचाल, छाया उपाध्याय द्वारा किया गया। इस अवसर पर  डॉ. स्मिता भवालकर, डॉ. रफीक नागोरी, रमेश राय, डॉ. योगेश कुल्मी, संदीप बामनिया, क्षमाशील मिश्रा, अनिल गुप्ता, डॉ. अमिता मंडलोई, ओमप्रकाश कुमायू सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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आज जिसका नाम रॉकेट साइंस है, उसकी झलक तो रामायण और महाभारत में ही मिलती है
'भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, उसकी परंपराओं में बसती है' विषय पर अपनी बात रखते हुए डॉ. मोहन दास हेगड़े ने कहा कि हमारे शास्त्रों में वह वैज्ञानिक दृष्टि है, जिसे दुनिया अब समझ रही है। फिजिक्स, खगोल, ध्वनि, ऊर्जा और चेतना इन सबका अद्भुत ज्ञान वेदों में पहले से लिखा है। आज जिसका नाम रॉकेट साइंस है, उसकी झलक तो रामायण और महाभारत के समय में ही मिलती है। शब्द बाण, दिव्य अस्त्र और साधना से प्राप्त अद्भुत शक्तियां किसी काल्पनिक कहानी का हिस्सा नहीं थीं। वे तपस्या और योग की गहरी साधना से उपजे वैज्ञानिक सिद्धांत थे। हमारे प्राचीन विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला शिक्षा के केंद्र ही नहीं, बल्कि रिसर्च और नये ज्ञान के विशाल स्रोत थे। चाणक्य जैसा महामानव तो केवल एक उदाहरण है। उस काल में ऐसे अनगिनत विद्वान थे, जिन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा को विश्व में अद्वितीय बनाया।

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रामायण जिसमें दो भाई राम और भरत कुछ पाने नहीं देने के लिए संघर्ष करते हैं
समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं साहित्यकार तुलसीदास परोहा ने कहा कि भारतीय संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की शक्ति रखती है, पर आज हमारे भीतर संग्रहवादी और भौतिकवादी प्रवृत्तियां इतनी हावी हो गई हैं कि हम अपने ही मूल उद्देश्य से भटकने लगे हैं। जीवन भर हम सुख सुविधाओं के साधन जुटाने में लगे रहते हैं, शक्ति और संपत्ति का संग्रह करते रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद मन की शांति हमें नहीं मिल पाती। उन्होंने कहा कि सुख वस्तुओं के ढेर लगाने से नहीं मिलता, सुख मन की अवस्था है। हमारी परंपरा कहती है कि वस्तुओं का त्यागपूर्वक उपयोग करें, तभी जीवन में संतोष आता है। भारतीय संस्कृति त्याग की संस्कृति है। रामायण इसका सबसे सुंदर उदाहरण है, जहां दो भाई राम और भरत कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे को देने के लिए संघर्ष करते हैं। यही हमारे मूल्य, यही हमारा मार्गदर्शन हैं।
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