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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   122 Years of Unwavering Devotion: Puryavyu Tauri’s Iconic Shoulder-Borne Kali Mai in Sagar

अटूट आस्था और परंपरा का अनूठा संगम: 122वें वर्ष में प्रवेश कर रही है पुरव्याऊ टौरी की कांधे वाली काली माई

Sat, 17 Oct 2026 02:30 PM IST
सागर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर Published by: सागर ब्यूरो Updated Sat, 17 Oct 2026 02:30 PM IST
सार

मध्य प्रदेश के सागर स्थित पुरव्याऊ टौरी की ऐतिहासिक कांधे वाली काली माई की परंपरा 1905 से चली आ रही है। इस वर्ष माता 122वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमा को भक्त कंधों पर उठाकर विसर्जन जुलूस निकालते हैं, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।

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122 Years of Unwavering Devotion: Puryavyu Tauri’s Iconic Shoulder-Borne Kali Mai in Sagar
कांधे वाली माता - फोटो : credit

विस्तार

बुंदेलखंड क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र, मध्य प्रदेश के सागर शहर के पुरव्याऊ टौरी में विराजमान होने वाली ऐतिहासिक कांधे वाली काली माई (चल माई काली) इस वर्ष अपनी स्थापना के 122वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। वर्ष 1905 से चली आ रही इस विशिष्ट परंपरा को वार्डवासियों के पूर्ण सहयोग से ठाकुर परिवार द्वारा हर साल अत्यंत निष्ठा और भव्यता के साथ निभाया जा रहा है।

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भक्तों के कंधों पर सवार होकर तय करती हैं यात्रा
इस अलौकिक प्रतिमा का नाम कांधे वाली काली इसीलिए पड़ा है, क्योंकि स्थापना के दिन से लेकर नवमी और दशमी के विसर्जन जुलूस तक, माता की प्रतिमा को किसी भी वाहन पर नहीं, बल्कि भक्तगण बारी-बारी से अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं। विसर्जन यात्रा के दौरान माता को कंधा देने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं, जो इस आयोजन का सबसे भावुक और मुख्य आकर्षण होता है।
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120 वर्षों से अधिक समय से अपरिवर्तित है मूल स्वरूप
मूर्तिकार हीरासिंह राजपूत द्वारा वर्ष 1905 में महिषासुर मर्दिनी स्वरूप में पहली बार यह प्रतिमा स्थापित की गई थी। 'श्री सार्वदेशिक दुर्गा महोत्सव समिति (पुरव्याऊ टौरी)' द्वारा आज भी माता का वही मूल स्वरूप, आकार और भाव बिना किसी बदलाव के हर साल तैयार किया जाता है, जो इस परंपरा की ऐतिहासिकता को जीवंत रखता है।

पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक निर्माण
यह प्रतिमा आधुनिकता की दौड़ से दूर पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल बनाई जाती है। इसके निर्माण में किसी भी प्रकार के सिंथेटिक या रासायनिक रंगों (केमिकल) का उपयोग नहीं होता है। स्थानीय काली मिट्टी, वाटर कलर और हाथ से तैयार प्राकृतिक शृंगार सामग्री से ही माता का यह अलौकिक रूप गढ़ा जाता है।

पारंपरिक पोशाक और ऐतिहासिक आभूषण
माता रानी को पारंपरिक मराठी साड़ी पहनाई जाती है। इसके साथ ही, दशकों पुरानी प्रामाणिक पारंपरिक पायल और आभूषण माता को धारण कराए जाते हैं। इन आभूषणों और मुकुट का निर्माण समिति के सदस्य स्वयं अत्यंत श्रद्धापूर्वक करते हैं।


मशाल की रोशनी और गूंजते जयकारे
विसर्जन चल समारोह के दौरान पूरा सागर शहर चल माई काली माई के जयकारों से गूंज उठता है। जुलूस के आगे-आगे ब्रिटिश काल से चली आ रही पलीता (मशाल) जलाने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है, जो प्राचीन काल में रोशनी के प्रबंध के रूप में शुरू हुई थी और आज इस ऐतिहासिक धरोहर का अहम हिस्सा बन चुकी है।

नम आंखों से होती है विदाई
पुरव्याऊ से शुरू होकर तीनबत्ती, कटरा बाजार और शहर के मुख्य मार्गों से गुजरने वाले इस विशाल चल समारोह में पूरा सागर उमड़ पड़ता है। जब माता कंधों पर सवार होकर विसर्जन स्थल की ओर प्रस्थान करती हैं, तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं। क्षेत्र के लोगों का अटूट विश्वास है कि सच्चे मन से माता के दरबार में आने वाले किसी भी भक्त की झोली खाली नहीं रहती।

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