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दुखद: संस्कृत के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय डॉ. रेवा प्रसाद का निधन, 86 साल की उम्र में ली अंतिम सांस
Sun, 23 May 2021 01:36 PM IST
Tanuja Yadav
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Tanuja Yadav
Updated Sun, 23 May 2021 01:36 PM IST
सार
मूल रूप से मध्यप्रदेश के रहने वाले डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी का 86 साल की उम्र में निधन हो गया। बनारस में उन्होंने अंतिम सांस ली। डॉ. रेवा संस्कृत भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे।
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डॉ रेवा प्रसाद द्विवेदी
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
देश के शिक्षा जगत से दुखद खबर सामने आ रही है। संस्कृत के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी का निधन हो गया। बता दें कि शनिवार (22 मई) को बनारस में 86 साल की उम्र में डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी ने आखिरी सांस ली। डॉ. रेवा प्रसाद मूल रूप से मध्यप्रदेश के थे। बता दें कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. रेवा प्रसाद के निधन पर दुख जताया।
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डॉ. रेवा प्रसाद का जन्म सीहोर जिले के बुधनी के पास नादनेर गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था। ऐसा बताया जाता है कि डॉ. रेवा प्रसाद का आरंभिक जीवन बेदह संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमए किया और इंदौर के शासकीय कला और वाणिज्य महाविद्यालय से शुरू पढ़ाना शुरू किया।
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डॉ. रेवा प्रसाद को मिली ये उपाधियां
इसके अलावा डॉ. रेवा प्रसाद ने रविशंकर विश्वविद्यालय से पीएचडी और जबलपुर विवि से डीलिट की उपाधि ली। बता दें कि डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित कराने के पक्षधर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने कई शीर्ष नेताओं से संपर्क किया और पत्राचार किया।
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डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी का मानना था कि देश में सबसे ज्यादा अच्छी हिंदी मध्यप्रदेश के लोगों की है। वे बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के संस्कृत, प्राच्य विद्या और धर्म विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष और बाद मे संस्कृत के प्रोफेसर एमिरिटस रहे। उन्हें अनेक शीर्षस्थ राष्ट्रीय सम्मान मिले।
डॉ. रेवा प्रसाद मिले ये सम्मान
राष्ट्रपति नीलम संजीव ने साल 1979 में उन्हें संस्कृत के सर्वोच्च साहित्यिक से सम्मानित किया था। तब डॉ. रेवा प्रसाद की आयु सिर्फ 45 वर्ष की थी। इतनी कम उम्र में यह सम्मान पाने वाले वे पहले विद्वान थे। उन्हें एशियाटिक सोसायटी मुंबई ने 1983 में महामहोपाध्याय पीवी काणे स्वर्ण पदक प्रदान किया था।
1991 में उन्हें साहित्य अकादमी नई दिल्ली की ओर से सम्मानित किया गया। उन्होंने बनारस में 1980 के दशक में विश्व संस्कृत सम्मेलन आयोजित कराया और कई देशों में विश्व संस्कृत सम्मेलनों में भागीदारी की। इसके अलावा डॉ. रेवा प्रसाद ने 13,000 श्लोकों वाले तीन संस्कृत महाकाव्य, पांच किताबें और दो नाटक लिखे।
