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MP High Court News: MPMSU अंक घोटाला मामले में माइंड लॉजिक कंपनी ने जांच कमेटी को दिया पूरा डाटा
Wed, 16 Feb 2022 01:55 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Wed, 16 Feb 2022 01:55 PM IST
सार
मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी (MPMSU) में हुए अंक घोटाले व आर्थिक अनियमितताओं के मामले में याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान युगलपीठ को ठेकेदार माइंड लॉजिक कंपनी ने जांच कमेटी को पूरा डाटा जांच उपलब्ध कराने की जानकारी दी।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी (MPMSU) में हुए अंक घोटाले व आर्थिक अनियमितताओं के मामले में मंगलवार को याचिका पर सुनवाई की गई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट जस्टिस शील नागू और जस्टिस सुनीता यादव की युगलपीठ को ठेकेदार माइंड लॉजिक कंपनी की तरफ से बताया गया कि उन्होंने पूरा डाटा जांच कमेटी को उपलब्ध करवा दिया है। डाटा उपलब्ध करवाने से संबंधित कमेटी के सदस्य द्वारा भेजे गये ई-मेल की प्रति भी युगलपीठ के समक्ष पेश की गई। युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई 17 फरवरी को निर्धारित की है। पिछली सुनवाई के दौरान गठित जांच कमेटी ने अपनी अंतरित रिपोर्ट में ठेकेदार कंपनी द्वारा पूर्ण डाटा उपलब्ध नहीं कराने की जानकारी युगलपीठ के समझ पेश की थी।
मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी में हुए अंक घोटाले, आर्थिक अनियमितताओं, भ्रष्टाचार को चुनौती देते हुए तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। मेडिकल विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा हटाए जाने के खिलाफ तीन अधिकारियों तथा निलंबित किए जाने के खिलाफ माइंड लॉजिक कंपनी ने याचिका दायर की थी। इसके अलावा तत्कालीन प्रभावी कुलसचिव के खिलाफ राज्य सरकार की तरफ से याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि सरकार के आदेश में तत्कालीन प्रभारी कुलसचित डॉ जे के गुप्ता ने जांच की थी। जांच में पाया गया था कि परीक्षा के आयोजन तथा मार्कशीट तैयार करने वाली ठेका कंपनी माइंट लॉजिट इंफ्रो ने परीक्षार्थियों के नम्बर में फेरबदल किया है। इसके अलावा छात्रों का डेटा एमयू की ऑफिशियल साइट नहीं बल्कि निजी साइट में तैयार किया गया था। जांच के बाद उक्त कंपनी को निलंबित कर दिया गया है।
पूरी जांच में डॉ वृंदा सक्सेना की भूमिका संदिग्ध है। इसके बावजूद भी वह परीक्षा नियंत्रक के पद पर बनी हुई हैं। जिस कंपनी को निलंबित किया गया था, उसने पूर्व में आगरा मेडिकल यूनिवर्सिटी में काम किया था। फर्जी मार्कशीट सहित अन्य अनियमितताओं के खिलाफ आगरा मेडिकल यूनिवर्सिटी ने उनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर भी दर्ज करवाई थी। जांच में दोषी पाये जाने के बावजूद भी ठेका कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी है।
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हाईकोर्ट के आदेश पर याचिकाओं में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस के के त्रिवेदी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी गठित की गयी थी। कमेटी में डीईजी साइबर क्राइम भोपाल योगेश देशमुख, राजीव गांधी प्रौधोगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति सुनील कुमार गुप्ता, एमपीएसआईडीसी के बी त्रिपाठी तथा इंजीनियर प्रियांश सोनी को सदस्य बनाया गया है। कमेटी को एक माह की निर्धारित समय अवधि में अपनी जांच पूर्ण कर रिपोर्ट पेश करनी थी।
कमेटी की तरफ से हाईकोर्ट में पेश की गयी अंतरित रिपोर्ट में कहा गया था कि ठेकेदार कंपनी ने परीक्षा व रिजल्ट संबंधित पूरा डाटा उपलब्ध नहीं करवाया है, जिसके कारण वह निर्धारित अवधि में जांच पूर्ण नहीं कर पाए हैं। युगलपीठ ने छात्रों के भविष्य पर चिंता व्यक्त करते हुए आदेश पालन के संबंध में संबंधित कंपनी को पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिये थे। याचिका पर सुनवाई के दौरान ठेकेदार कंपनी द्वारा डाटा उपलब्ध कराने की जानकारी पेश की गयी।
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मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी में हुए अंक घोटाले, आर्थिक अनियमितताओं, भ्रष्टाचार को चुनौती देते हुए तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। मेडिकल विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा हटाए जाने के खिलाफ तीन अधिकारियों तथा निलंबित किए जाने के खिलाफ माइंड लॉजिक कंपनी ने याचिका दायर की थी। इसके अलावा तत्कालीन प्रभावी कुलसचिव के खिलाफ राज्य सरकार की तरफ से याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि सरकार के आदेश में तत्कालीन प्रभारी कुलसचित डॉ जे के गुप्ता ने जांच की थी। जांच में पाया गया था कि परीक्षा के आयोजन तथा मार्कशीट तैयार करने वाली ठेका कंपनी माइंट लॉजिट इंफ्रो ने परीक्षार्थियों के नम्बर में फेरबदल किया है। इसके अलावा छात्रों का डेटा एमयू की ऑफिशियल साइट नहीं बल्कि निजी साइट में तैयार किया गया था। जांच के बाद उक्त कंपनी को निलंबित कर दिया गया है।
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पूरी जांच में डॉ वृंदा सक्सेना की भूमिका संदिग्ध है। इसके बावजूद भी वह परीक्षा नियंत्रक के पद पर बनी हुई हैं। जिस कंपनी को निलंबित किया गया था, उसने पूर्व में आगरा मेडिकल यूनिवर्सिटी में काम किया था। फर्जी मार्कशीट सहित अन्य अनियमितताओं के खिलाफ आगरा मेडिकल यूनिवर्सिटी ने उनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर भी दर्ज करवाई थी। जांच में दोषी पाये जाने के बावजूद भी ठेका कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी है।
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हाईकोर्ट के आदेश पर याचिकाओं में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस के के त्रिवेदी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी गठित की गयी थी। कमेटी में डीईजी साइबर क्राइम भोपाल योगेश देशमुख, राजीव गांधी प्रौधोगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति सुनील कुमार गुप्ता, एमपीएसआईडीसी के बी त्रिपाठी तथा इंजीनियर प्रियांश सोनी को सदस्य बनाया गया है। कमेटी को एक माह की निर्धारित समय अवधि में अपनी जांच पूर्ण कर रिपोर्ट पेश करनी थी।
कमेटी की तरफ से हाईकोर्ट में पेश की गयी अंतरित रिपोर्ट में कहा गया था कि ठेकेदार कंपनी ने परीक्षा व रिजल्ट संबंधित पूरा डाटा उपलब्ध नहीं करवाया है, जिसके कारण वह निर्धारित अवधि में जांच पूर्ण नहीं कर पाए हैं। युगलपीठ ने छात्रों के भविष्य पर चिंता व्यक्त करते हुए आदेश पालन के संबंध में संबंधित कंपनी को पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिये थे। याचिका पर सुनवाई के दौरान ठेकेदार कंपनी द्वारा डाटा उपलब्ध कराने की जानकारी पेश की गयी।
