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मध्यप्रदेश: झाबुआ में दो भूरिया की लड़ाई में जाति बनी बड़ा मुद्दा, भीली भाषा में क्यों प्रचार कर रहे सियासी दल

Thu, 16 Nov 2023 06:59 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Thu, 16 Nov 2023 06:59 PM IST
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सार
आजादी के बाद चुनाव होते रहे, लेकिन 1967 से बापू सिंह डामोर ऐसे कांग्रेसी नेता थे, जो झाबुआ चुनाव जीतने में कामयाब होते रहे। अंतिम चुनाव 1993 में डामोर ने लड़ा और जीता। इसके बाद हर चुनाव में उम्मीदवार दोनों प्रमुख पार्टी के भले ही बदलते रहे, लेकिन भोपाल विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने का मौका किसी भी विधायक को दूसरी बार नहीं मिला...
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Madhya Pradesh: Caste became a big issue in the fight between two Bhuriyas in Jhabua tribal area
MP Election - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

आदिवासी बेल्ट की प्रमुख विधानसभा सीट झाबुआ पर भाजपा-कांग्रेस दोनों की नजर बनी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर सीएम शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह इस सीट पर सभा कर चुके हैं। कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाली झाबुआ सीट पर इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया की साख दांव पर है। कांग्रेस ने उनके बेटे डॉ. विक्रांत भूरिया को मैदान में उतारा है। उन्हें कड़ी चुनौती भाजपा प्रत्याशी भानू भूरिया दे रहे हैं। असली-नकली आदिवासी को लेकर दलों का द्वंद्व अब चुनावी मुद्दा बनने लगा है, क्योंकि भाजपा प्रत्याशी ने कांग्रेस प्रत्याशी को नकली आदिवासी बताकर चुनौती दे डाली है। इसके जवाब में कांग्रेस उम्मीदवार ने भीली भाषा में प्रचार करना शुरू कर दिया है।

1993 से झाबुआ विधानसभा का रोचक बिंदु यह है कि यहां किसी भी विधायक ने अपना कार्यकाल दूसरी बार दोहराया नहीं है। हर चुनाव में झाबुआ का विधायक पिछले 30 वर्षों से बदलता रहा है। मजेदार बात यह है कि यह राजनीति रिकॉर्ड इस बार भी कायम रहेगा। वजह है कि पूर्व विधायक को दोनों प्रमुख दलों ने मैदान में नहीं उतारा है। झाबुआ में भूरिया विरुद्ध भूरिया की जंग का रोमांच पहले दिन से चल पड़ा है। कांग्रेस उम्मीदवार विक्रांत भूरिया और भाजपा उम्मीदवार भानु भूरिया की खासियत यह है कि दोनों ने एक-एक चुनाव लड़े हैं और दोनों ने ही हार का मुंह देखा है।

आजादी के बाद चुनाव होते रहे, लेकिन 1967 से बापू सिंह डामोर ऐसे कांग्रेसी नेता आए जो झाबुआ चुनाव जीतने में कामयाब होते रहे। अंतिम चुनाव 1993 में डामोर ने लड़ा और जीता। इसके बाद हर चुनाव में उम्मीदवार दोनों प्रमुख पार्टी के भले ही बदलते रहे, लेकिन भोपाल विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने का मौका किसी भी विधायक को दूसरी बार नहीं मिला। झाबुआ में अब तक हुए 15 चुनावों में से 10 बार कांग्रेस, दो बार सोशलिस्ट और तीन बार भाजपा जीती है। 2013 व 2018 में भाजपा लगातार जीती, लेकिन 2019 में हुए उपचुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने यहां से भाजपा के भानू भूरिया को 27 हजार से ज्यादा मतों से हराया था।

विक्रांत नहीं है असली आदिवासी: भानु भूरिया

भाजपा उम्मीदवार भानू भूरिया चर्चा में कहते हैं कि डॉ. विक्रांत भूरिया असली आदिवासी नहीं है। यदि वे असली आदिवासी हैं, तो यहां आकर मेरे साथ आदिवासी भाषा में बात करके दिखाएं। खेत में आकर मेरे साथ हल चलाकर बताएं। कहीं पहाड़ी पर चलकर मेरे साथ गोफन से पत्थर फेंक कर बताएं कि कौन आदिवासी है। मैं विक्रांत से कहता हूं कि 25 हाथ की पगड़ी लेकर आएं, मैं एक मिनट में बांधकर बताता हूं कि मैं भील का बेटा हूं। विक्रांत को भीलों के रीति रिवाज नहीं मालूम। उन्हें ये नहीं पता कि भीलों में किस तरह से विवाह होते हैं, किस तरह मामेरा होता है और किस तरह से नौतरा पड़ता है। वे आगे कहते हैं कि मैं आदिवासियों की सेवा करने आया हूं।

भानू कहते हैं कि विक्रांत ने आदिवासियों का हक मारा है। कोरोना जैसी भयानक महामारी के वक्त वे कहां थे। विक्रांत ने आदिवासी कोटे से एमबीबीएस में प्रवेश लिया। फिर जैसे-तैसे डॉक्टर बने और जिला अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अगर वे एक आदिवासी का हक नहीं मारते, तो उनकी जगह कोई आदिवासी डॉक्टर होता, जो कोरोना काल में जिला अस्पताल में सेवाएं देते हुए जनता की सेवा करता। भाजपा को न तो कांतिलाल भूरिया से कोई चुनौती है और न ही विक्रांत भूरिया से। कांतिलाल भूरिया ने लगातार इतने लंबे समय तक राजनीति की। उस समय राजनीति की, जब ये क्षेत्र शिक्षा के मामले में पिछड़ा हुआ था। कांतिलाल भूरिया ने हमारे अनपढ़ भाइयों का वोट लेकर उनका खून चूसने का काम किया है। आज पढ़ा-लिखा युवा उसका बदला चुकाने को तैयार है। कांतिलाल भूरिया ने 42 साल से युवाओं को बेवकूफ बनाकर शासन किया। जनता उनकी करनी और कथनी को समझ चुकी है और पूरी तरह से उन्हें सबक सिखाने के लिए यहां का युवा तैयार है।

विक्रांत भूरिया भी इस दे रहे रहे जवाब

इधर कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. विक्रांत भूरिया भी गांव में खाट चौपाल लगा रहे हैं। वे भी आदिवासियों से संवाद की शुरुआत 'बदा भाइयों ने राम-राम' कहते हुए करते हैं। वे भीली भाषा में ही कहते हैं- हमू पक्का आदिवासी। अपने भाषण के दौरान वे बीच-बीच में भीली भाषा के शब्दों का उपयोग करते हुए कहते हैं- अब अपना मोटो चुनाव आवी गया है। भोपाल ती सरकार को चुनाव। यो सबसे मोटो चुनाव से, बाकी सब नाना चुनाव से। इसमें सरकार अपनी बनी री।

विक्रांत भूरिया भाजपा के भानू भूरिया के आरोपों का जवाब देते हुए भीली भाषा में ही कहते हैं- भानू ये किदो-भाटा मारवा वालों असल आदिवासी है, अब मैं पूछूं कि असल आदमी छे कि बदमाश आदमी छे। इसके बाद डॉ. विक्रांत हिन्दी में कहते हैं- भानू भूरिया हर आदिवासी के हाथ में गोफन थमाना चाहता है और हम हर आदिवासी के हाथ में रोजगार देना चाहते हैं। ये अंतर है। गोफन चला चलाकर वो लोगों को लड़वा रहे हैं और गुंडे यही तो करते हैं। वो बदमाश लोग हैं और ये साबित खुद ने कर दिया। मुझे इसका जवाब देने की जjtरत ही नहीं।

इसलिए भीली भाषा में हो रहे भाषण

दरअसल, झाबुआ जिले में भीली भाषा में संवाद करना कोई अनोखी बात नहीं है। यहां के अधिकांश शहरी लोग भी ग्रामीणों से भीली भाषा में ही संवाद करते हैं, क्योंकि सामाजिक दृष्टिकोण से इससे एक-दूसरे के प्रति अपनापन महसूस होता है। अब विधानसभा चुनाव के दौरान झाबुआ की सियासत में भीली भाषा की एकाएक एंट्री 30 अक्तूबर के बाद तब हुई, जब भाजपा की चुनावी सभा में असली-नकली आदिवासी का मुद्दा उठा। अब इन्हीं आरोप-प्रत्यारोप के बीच भीली भाषा भी चुनावी मुद्दा बन गई है। दोनों पार्टियां अब पूरा प्रचार भीली भाषा में करते हुए नजर आ रहे हैं।

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