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मध्यप्रदेश चुनाव: मालवा में कैसे तय होगा सोयाबीन से सरकार तक का सफर?

Wed, 21 Nov 2018 07:42 PM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 21 Nov 2018 07:42 PM IST
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Madhya pradesh assembly election 2018: Soyabean farming to play key role in Malwa region
सोयाबीन बना चुनावी मुद्दा
मध्यप्रदेश के चुनाव में किसान और किसानी अहम मुद्दा बना हुआ है। मालवा मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा क्षेत्र और भाजपा का सबसे बड़ा गढ़ है। प्रदेश में आधे से ज्यादा सोयाबीन मालवा क्षेत्र में ही उगाया जाता है।
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यही कारण है कि मालवा को इंदौर का शिकागो कहा जाता है। आलम यह है कि सोयाबीन की फसल यहां के लोगों के लिए चुनावी मुद्दा है ठीक उसी तरह जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना। मगर बीते कुछ सालों से सोयाबीन की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है।
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पश्चिमी मध्यप्रदेश के देवास, इंदौर,धार, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच शाजापुर और राजगढ़ जिलों के किसान पारंपरिक रूप से केवल रबी की फसल करते थे। खरीफ के समय वह बारिश की वजह से फसल नहीं करते और खेत को पानी सोखने के लिए छोड़ देते थे। नमी वाली मिट्टी का इस्तेमाल वह रबी की फसल के समय करते थे।
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सत्तर के दशक में ट्यूबवेल के आने से यह स्थिति बदली। ट्यूबवेल के आने से खरीफ की उपज में इजाफा हुआ और किसानों ने जल संचयन करना छोड़ दिया।

सोयाबीन की फसल दो से तीन दिनों तक जल भराव झेल सकती है। इसके अलावा दो से तीन हफ्तों तक सिंचाई के बिना भी रह सकती है। फसल काटे जाने पर यह मिट्टी में 40 से 45 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर छोड़ देती है जो 50 किलो यूरिया के बराबर है। इससे अगली फसल को लाभ होता है।


सोयाबीन की बनती-बिगड़ती किस्मत

राज्य में शिवराज सरकार बनने के बाद सोयाबीन के किसानों की किस्मत बदली। 2002-03 और 2013-14 में निर्यात 1,360 करोड़ से बढ़कर 14,500 करोड़ हो गया। इस दौरान इंदौर के बाजार में सोयाबीन की कीमत 1,353 रुपये से बढ़कर 3,667 रुपये हो गई।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2013-14 के बाद वैश्विक स्तर पर एग्री उत्पादों की कीमतों में आई कमी ने सोयाबीन को भी अपनी चपेट में ले लिया। 2015-16 में सोयाबीन का निर्यात गिरकर 1,900 हो गया। मंडी में भी सोयाबीन की कीमतें 2,900 से 3,000 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गई।

यह गिरावट आर्थिक नहीं बल्कि भौगौलिक रूप से भी हुई। खासकर मालवा में जहां सोयाबीन की वजह से भूजल का जमकर दोहन हुआ। इस दोहन की वजह से अब पुराने ट्यूबवेल ठीक से काम नहीं करते क्योंकि जल स्तर नीचे  आने से अतिरिक्त खुदाई की जरूरत है।

बीमारियों का शिकार हुआ सोयाबीन

सोयाबीन को कई तरह की बीमारियों ने भी घेर लिया। उत्तर भारत से शुरू हुआ येलो मोजैक वायरस इनमें प्रमुख है। 2015 के बाद से मध्य भारत का सोयाबीन कॉलर रुट जैसी फंगल बीमारियों से प्रभावित हुआ है।

यैलो मोजैक वायरस फैलाने वाला वाइट फ्लाई और तनों को अंदर से खोखला कर देने वाला स्टेम फ्लाई और टोबैको कैटरपिलर जैसे कीड़े भी इसके पीछे एक मुख्य कारण है। फसल प्रभावित होने का मुख्य कारण साल दर साल एक ही तरह की फसल का लगाया जाना भी है। देश में 10.2 मिलियन हेक्टेयर पर सोयाबीन की उपज होती है। मालवा में इसका आधा उगाया जाता है। गेहूं और सोयाबीन ही यहां की मुख्य फसलें हैं।


पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूरे मालवा क्षेत्र में अपना परचम लहराया था। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को मतदान होना है। ऐसे में पांच मिलियन हेक्टेयर में उपजाए जाने वाले सोयाबीन के मुद्दे से पार पाए बिना कोई भी पार्टी प्रदेश की सत्ता पर काबिज नहीं हो सकती।
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