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मध्यप्रदेश चुनाव: हिंदुत्व राजनीति की भेंट चढ़ रहा 'असली गौरक्षक' का हित

चुनाव डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Updated Wed, 05 Dec 2018 01:52 PM IST
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भारतीय जनता पार्टी की सरकारों को गौ सेवा करने को लेकर हमेशा से ही अति-हिंदूवादी कहा गया है। जब कांग्रेस ने मध्यप्रदेश चुनाव को लेकर अपने मैनिफेस्टो में गौशाला के निर्माण की बात कही तब भाजपा ने गौरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। केंद्र की वामपंथी ताकतों ने भी इस मुद्दे पर भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए कांग्रेस पर हिंदू मतदाताओं को लुभाने का प्रयास करार दिया। 

आवारा मवेशी सबसे बड़ा खतरा

सॉफ्ट हिंदुत्व की इस बहस के बावजूद गौशाला को लेकर जमीनी हकीकत कुछ और नजर आती है। सागर जिले के सुरखी विधानसभा क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ता आवारा मवेशियों को किसान का सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। आवारा मवेशियों के फसल को नुकसान पहुंचाने से न केवल आर्थिक हानि होती है, बल्कि यह झगड़े का कारण भी बन जाता है। फसल का मालिक मवेशी के मालिक पर जानबूझकर फसल को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हैं। आवारा मवेशियों की यह समस्या पूरे राज्य में एक जैसी ही है। सरकार को इन आवारा पशुओं के लिए शालाएं बनाने की जरूरत है।
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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक हाईवे पर मंडराते मवेशियों का झुंड आने-जाने वाली गाड़ियों के लिए सड़क के गड्ढों से भी बड़ा खतरा बन चुका है। हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए किसान नेता केदार सिरोही ने इस रिपोर्ट में बताया कि मवेशियों का उत्पात इस वक्त राज्य के किसानों के लिए बड़ी समस्या है। वो कम दाम पर भी अपनी फसल बेचने को तैयार हैं अगर कोई इस समस्या से निजात दिलाने का वादा करें। 

सिरोही के मुताबिक भारत में डेयरी क्रांति भी इसके पीछे की एक वजह है। अगर आपके पास ज्यादा दूध देने वाला मवेशी नहीं है तो किसानों को एक लीटर दूध की लागत 80 से 90 रुपये तक आती है जबकि मार्केट में दूध की कीमत 25 रुपये तक गिर चुकी है। दूध की कीमतों में गिरावट ने भी पशुपालकों का मनोबल कम किया है।

बाड़े भी स्थाई समाधान नहीं

कुछ किसान फसलों को बचाने के लिए अपने खर्चे से बाड़े भी बनाते है मगर यह भी उन्हें स्थाई समाधान नहीं दे पाता। आबादी बढ़ने की वजह से शहरीकरण और खेती की जमीन दोनों में ही इजाफा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि 1992-93 और 2012-13 के बीच मवेशियों की संख्या में 8% का इजाफा हुआ मगर इस दशक में मवेशियों के लिए मौजूद स्थाई जमीन में 15 फीसदी तक गिरावट आई। वर्तमान में इन आंकड़ों में और भी बढ़ोतरी संभव है।

गौरक्षकों के हमलों ने भी इस धंधे पर असर डाला है। पालक किसानों के लिए जो पशु पहले संपत्ति माना जाता था, अब वो बोझ बन चुका है। किसान खुद पर पहले जितना धन तो खर्च कर रहा है मगर उतनी आमदनी नहीं कर पा रहा।  जरुरत पड़ने पर वह अपने मवेशी को उचित दाम पर बेच भी नहीं पा रहा है।

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