फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan

इस बड़ी सौगात के लिए शिवराज चौहान को मायावती से कहना चाहिए- थैंक यू!

Fri, 23 Nov 2018 03:37 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 23 Nov 2018 03:37 PM IST
विज्ञापन
madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan
शिवराज के लिए 'संजीवनी' बनकर आईं मायावती - फोटो : अमर उजाला

मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल इलाके में कुल 34 विधानसभा सीटें हैं। बीजेपी ने 2013 के विधानसभा चुनाव में 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पिछले एक साल में इस इलाके की राजनीति में जो बदलाव आए हैं उससे सत्ताधारी बीजेपी के पांव तले से जमीन खिसकती दिख रही है। इस इलाके के कोलारस और मुंगावली विधानसभा सीटों पर इसी साल हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। दोनों सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद अप्रैल महीने में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, उसका केंद्र भी यही इलाका था।

विज्ञापन

इस इलाके के युवा दलित एक्टिविस्ट सुधीर कोले का कहना है कि हालात पूरी तरह से बदले हुए हैं। कोले का मानना है कि इस बार यहां कुछ भी एकतरफा नहीं है। दोनों पार्टियों में कांटे की टक्कर है और कुछ सीटों पर बहुजन समाज पार्टी भी मजबूती से लड़ रही है।

विज्ञापन

चंबल का दलित फैक्टर

ग्वालियर-चंबल इलाके में दलितों की आबादी सबसे ज्यादा है और सवर्णों में ठाकुर और ब्राह्मण बहुसंख्यक हैं। ग्वालियर के स्थानीय पत्रकार राजेश अचल कहते हैं कि इस बार चंबल का दंगल काफी दिलचस्प हो गया है और इससे बीजेपी का परेशान होना स्वाभाविक है।

विज्ञापन
विज्ञापन


एससी-एसटी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट से कथित तौर पर कमजोर किए जाने के खिलाफ दो अप्रैल को इस इलाके में भड़के विरोध-प्रदर्शन में सात लोग मारे गए थे। यह लड़ाई दलित बनाम सवर्ण बन गई थी। इस विरोध-प्रदर्शन के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए एससी-एसटी एक्ट को मूल स्वरूप में ला दिया था। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार का यह कदम सवर्णों को रास नहीं आया। ग्वालियर-चंबल इलाके में इसे लेकर उपजी हिंसा का जख्म अब भी हरा है और इसका असर जातीय मेल-जोल पर बहुत गहरा पड़ा है।

भाजपा से नाराज हैं दलित?

madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan
दलित सम्मेलन में उमड़ा हुजूम - फोटो : अमर उजाला

सुधीर कोले कहते हैं कि दलित बीजेपी सरकार से नाराज हैं कि सरकार ने उन्हें असुरक्षित छोड़ दिया और सवर्ण नाराज हैं कि दलितों को खुश करने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया सुप्रीम कोर्ट ने दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा या प्रताड़ना के मामले में शिकायत दर्ज होने के बाद बिना जांच के तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी। इसे लेकर विरोध प्रर्दशन शुरू हुए तो मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए कानून को मूल स्वरूप में ला दिया था।

इस इलाके में दलितों में जाटव बहुसंख्यक हैं और इन्हें लगता है सरकार ने नाइंसाफी की है। दो अप्रैल को इस इलाके में भड़की हिंसा में दीपक मित्तल नाम के एक दलित युवक की ग्वालियर के गल्लार कोठा में गोली लगने से मौत हो गई थी। इस इलाके के लोगों का कहना है कि जिन्होंने गोली मारी वो आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। सुधीर कोले कहते हैं कि पर्याप्त सबूत होने के बावजूद न्याय नहीं मिला।

राजेश अचल कहते हैं कि इस बार मुकाबला तो पूरे प्रदेश में कांटे का है, लेकिन ग्वालियर और चंबल के इलाके में बीजेपी से सवर्ण और दलित एक साथ दोनों नाराज हैं।इस इलाके पर लोगों की खास नजर इसलिए भी है क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी यही इलाके है और उन्हें कांग्रेस के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है। इसी इलाके में सिंधिया राजघराने के असर को भी रेखांकित किया जाता है।

सिंधिया परिवार की भूमिका

madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan
विजयाराजे सिंधिया

इस इलाके में जाति के नाम पर जो नाइंसाफी होती है उसमें सिंधिया परिवार की भूमिका क्या होती है? ग्वालियर के जीवाजीराव यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एपीएस चौहान कहते हैं कि इस परिवार ने कुछ भी थोपने की कोशिश नहीं की है।वो कहते हैं, ''इस परिवार ने कभी किसी किस्म के टकराव को बढ़ावा नहीं दिया है। इसका प्रभाव आज के वक्त में भी इसलिए है क्योंकि इसने कई ट्रस्ट बना रखे हैं और ये ट्रस्ट जरूरतमंदों की कई तरह से मदद करते हैं। इसलिए इस परिवार के खिलाफ कोई आक्रामक विरोध नहीं होता है।

एपीएस चौहान कहते हैं कि इस बार इस इलाके में बीजेपी के खिलाफ दलितों में ग़ु्स्सा है और हो सकता है कि ये गुस्सा कांग्रेस के पक्ष में जाए। चौहान कहते हैं, ''मध्य प्रदेश में कभी दलित पहचान और आदिवासी पहचान को लेकर कोई आंदोलन नहीं हुआ। अगर ऐसा होता तो यहां तीसरी पार्टी भी आ सकती थी। यहां पिछड़ी जातियों का भी कोई आंदोलन नहीं हुआ। इस वजह से यहां दो ही पार्टियां मुख्य रूप से हैं। पर अब यहां भी पहचान की राजनीति को तवज्जो मिल रही है और ऐसा होता है तो आने वाले वक्त में इन दोनों पार्टियों को चुनौती मिल सकती है।

बीजेपी अगर पिछले 15 सालों से सत्ता में है तो इसमें 230 सीटों वाली विधानसभा में दलितों और आदिवासियों के लिए रिजर्व सीटों की अहम भूमिका रही है। दलितों के लिए 35 सीटें आरक्षित हैं और आदिवासियों के लिए 47 सीटें। पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2013 के चुनाव में बीजेपी ने दलितों के लिए 35 रिजर्व सीटों में से 28 पर जीत दर्ज की थी और आदिवासियों के लिए रिजर्व 47 सीटों में से 31 पर जीत मिली थी। यानी आरक्षित कुल 82 सीटों में से 59 पर जीत मिली थी।

चंबल-ग्वालियर इलाके में बीजेपी को एक उम्मीद बहुजन समाज पार्टी से है। बीजेपी को लगता है कि दलितों की नाराजगी लामबंद नहीं हो पाएगी क्योंकि बीएसपी और कांग्रेस के बीच वोट बंट जाएंगे। हालांकि एपीएस चौहान का कहना है कि उन्होंने एक सर्वे कराया था जिससे ये पता चला कि दलित बीजेपी के खिलाफ एकजुटता दिखा सकते हैं और वो कांग्रेस के पक्ष में जा सकते हैं। वहीं राजनीतिक विश्लेषक लज्जा शंकर हरदेनिया कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो सवर्णों की लामबंदी भी सामने आ सकती है और जाहिर है कि दलितों और सवर्णों की गोलबंदी एक साथ नहीं होगी।

लेकिन बीएसपी के मध्य प्रदेश प्रभारी मुकेश अहीरवार ने बीबीसी से कहा कि चंबल के दलित केवल बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के भी खिलाफ हैं। ग्वालियर-चंबल इलाके में दलितों के लिए सात सीटें रिजर्व हैं और बाकी की सीटों पर इनके वोट निर्णायक हैं।

पटेलों के बीच नाराजगी

madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan
दलित समाज के लोग - फोटो : अमर उजाला

इस इलाके में बीजेपी की दिक्कत ये है कि दलित के साथ सवर्ण और ओबीसी में पटेलों के बीच भी नाराजगी है। ये नाराजगी एससी-एसटी कानून में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के कारण है। इसी की प्रतिक्रिया में सामान्य पिछड़ा अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था यानी सपाक्स का निर्माण हुआ है। इस संगठन ने भी अपने कई उम्मीदवार उतारे हैं। वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर कहते हैं कि भले सपाक्स को कोई सीट ना मिले, लेकिन बीजेपी को नुकसान जरूर पहुंचा सकता है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की मजबूत जमीन है, लेकिन मायावती इसे भुनाने में नाकाम रही हैं। 1996 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के सुखलाल कुशवाहा ने अर्जुन सिंह को सतना से हरा दिया था। अर्जुन सिंह तीसरे नंबर पर थे और दूसरे नंबर पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा थे। मतलब कुशवाहा ने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों का हराया था। बीएसपी को मध्य प्रदेश के 1993 और 1998 के विधानसभा चुनाव में 11-11 सीटों पर जीत मिली थी।

छत्तीसगढ़ बन जाने के बाद कांशीराम और मायावती ने मध्य प्रदेश की बागडोर युवा और आक्रामक तेवर के माने जाने वाले नेता फूल सिंह बरैया के हाथों में सौंपी थी। बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद फूल सिंह बरैया ने 2002 से 2003 के बीच काफी मेहनत की। कांग्रेस के लिए यह चिंता बढ़ाने वाली थी क्योंकि दिग्विजय सिंह के खिलाफ 10 सालों की सत्ता विरोधी लहर भी थी।

मायावती की चुप्पी के मायने

madhya pradesh assembly election 20108 :Mayawati's entry benefits Shivraj singh chauhan
mayawati

2003 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टिकट बंटवारे को लेकर मायावती और बरैया में विवाद हुआ और उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2003 में बीएसपी की सीटें 11 से दो पर आ गईं। 2008 में बीएसपी को 8 सीटों पर जीत मिली और 2013 में चार सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इस बार फिर बीएसपी चुनावी मैदान में है। मुकेश अहीरवार का कहना है कि पार्टी का पूरा फोकस चंबल और बुंदेलखंड में है।

मध्य प्रदेश में सीपीएम के नेता बादल सरोज कहते हैं कि मायावती के लिए एमपी में मजबूत जमीन थी, लेकिन उन्होंने मध्य प्रदेश में दलितों के खिलाफ अत्याचार के मुद्दों पर हमेशा चुप रहना पसंद किया। दो अप्रैल की घटना पर पर भी उन्होंने ऐसा ही किया। सरोज कहते हैं, ''बुंदेलखंड और चंबल में दलितों के खिलाफ अत्याचार हमेशा से रहा है। अब तो पिछड़ी जाति के लोग भी इनके खिलाफ अत्याचार करते हैं। बीजेपी ने बड़ी चालाकी से पिछड़ी जातियों और दलितों में उपजातियों की लाइन खींच इनकी एकता तोड़ी है।

बादल सरोज कहते हैं कि बीएसपी दलितों को नेतृत्व देने में बुरी तरह से नाकाम रही है। राजनीतिक विश्लेषक लज्जा शंकर हरदेनिया का मानना है कि इस बार अगर बीएसपी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाता तो बीजेपी की हार तय थी, लेकिन मायावती ने नहीं किया। वो कहते हैं, ''ग्वालियर-चंबल इलाके में यह गठबंधन सभी 34 सीटों पर जीतने की क्षमता हासिल कर लेता, लेकिन मायावती ने अलग से उम्मीदवार उतारकर बीजेपी को बड़ी राहत दे दी है।

हरदेनिया कहते हैं मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने बीजेपी की छवि ब्राह्मण और बनियों की पार्टी से अलग बनाई है। वो कहते हैं, ''इस बार के चुनाव में साफ दिख रहा है कि गरीब तबका शिवराज सिंह चौहान के साथ है जबकि मध्य वर्ग और बड़े किसान शिवराज के खिलाफ है। यहां बीजेपी मोदी नहीं बल्कि शिवराज के नाम पर चुनाव लड़ रही है।मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी 36 फीसदी हैं। इसी आधार पर बीएसपी कभी नारा लगाती थी कि 'वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा' लेकिन अब वहीं बीएसपी इन वोटों को बाँटने के लिए जिम्मेदार बताई जा रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed