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कहीं भारी न पढ़ जाए मध्यप्रदेश भाजपा को आदिवासी नेताओं की कमी

Mon, 17 Sep 2018 08:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Updated Mon, 17 Sep 2018 08:28 AM IST
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Lack of tribal leaders in Madhya Pradesh BJP
अकोदिया में सीएम शिवराज सिंह चौहान

विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अब सभी पार्टियां वहां बनने वाले हर समीकरण को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार करने में लगीं हैं। इस दौड़ में न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस है बल्कि कुछ क्षेत्रीय और सामाजिक दल भी जुटे हुए हैं। चुनाव के दौरान आदिवासियों को यहां नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि सत्ता पहुंचने में वह बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। आदिवासियों का हमेशा से झुकाव कांग्रेस की ओर माना जाता रहा है। भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसे नेताओं की हमेशा कमी रही है जो इन्हें प्रभावित करने का काम कर सकें। 

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इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश के अलग होने के बाद से अभी तक यहां के भाजपा संगठन की कमान किसी भी आदिवासी नेता के हाथों में नहीं दी जा सकी है। आदिवासी वर्ग से भाजपा का आखिरी अध्यक्ष संयुक्त मध्यप्रदेश में नंदकुमार साय को बनाया गया था। वहीं कांग्रेस इस मामले में आगे रही और उसने कई बार संगठन की कमान आदिवासी वर्ग के नाताओं के हाथों में दी। झाबुआ के सांसद कांतिलाल भूरिया पिछले ही विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे।
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वर्तमान समय में शिवराज सरकार में आदिवासी मंत्रियों की संख्या काफी कम है। निमाड़ अंचल के बड़वानी जिले से अंतर सिंह आर्य और खंडवा से विजय शाह को छोड़ दिया जाए तो पूरा मालवा आदिवासी मंत्री के बिना ही है। इतना ही नहीं धार-झाबुआ जैसे आदिवासी बहुल जिलों से भी सरकार में कोई मंत्री नहीं हैं। विधानसभा की 47 सीटें इनके लिए आरक्षित हैं और वर्तमान में 32 पर भाजपा और 15 पर कांग्रेस विराजमान है। 
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राज्य में 21 जिले ऐसे हैं जहां आदिवासीओं संख्या अन्य के मुकाबले सबसे अधिक है। राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या का में यह 21 प्रतिशत का योगदान रखते हैं। इतना ही नहीं 35 ऐसी सीटें हैं जिन्हें अदिवासी वोटरों के समर्थन के बिना नहीं जीता जा सकता है। मध्यप्रदेश की राजनीति को देखते हुए यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि आगामी समय में सरकार बनाने में यह बहुत अहम भूमिक निभाने वाले हैं।

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