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नाव से नेवी तक का सफर: कभी पिता का कर्ज चुकाने के लिए पकड़ती थी मछलियां, अब लहरों पर राज करेगी ये लड़की
Mon, 03 Mar 2025 01:17 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा
Published by: अरविंद कुमार
Updated Mon, 03 Mar 2025 01:17 PM IST
सार
Khandwa Latest News: नाव से नेवी तक के सफर को पूरा करने के दौरान कावेरी को कई ताने भी सुना पड़े। लोग उसे गरीबी और लड़की होने का एहसास कराते रहे, लेकिन इसके बावजूद कभी कावेरी की हिम्मत नहीं टूटी। नेवी की वर्दी में वापस अपने घर पहुंची तो उसे देखकर माता-पिता की आंखों में आंसू छलक आए।
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कावेरी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्यप्रदेश में खंडवा जिले के ग्रामीण अंचल सिंगाजी ग्राम की रहने वाली गरीब घर और पिछड़े समुदाय की एक लड़की का सेलेक्शन इंडियन नेवी में हुआ है। इस सेलेक्शन की कहानी भी संघर्षों से भरी हुई है। अपनी उम्र के करीब नौ साल से शुरू हुआ उसके संघर्ष का ये सफर, अगले नौ सालों तक जारी रहा, जिसके बाद उसके पंखों को उड़ान मिली और आखिरकार अब वह भारतीय नौसेना में रहकर देश सेवा कर रही है।
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इसकी शुरुआत भी बड़ी मार्मिक थी, जब अपने पिता का करीब 40 हजार रुपये का कर्ज चुकाने के लिए नौ भाई बहनों में पांचवें नंबर की कावेरी नाव से मछली पकड़ने जाने लगी। इस तरह नाव से शुरू हुआ, उसका यह सफर इंडियन नेवी तक जा पहुंचा और अब वह उसी नाव से नेवी में कयाकिंग स्पोर्ट्स को देश दुनिया में रिप्रेजेंट कर रही हैं। नेवी में सेलेक्शन होने के बाद जब कावेरी पहली बार अपने गांव सिंगाजी लौटीं, तो पूरे परिवार और गांव वालों ने उनका जोरदार स्वागत किया। देश-विदेशों में कई मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाने वाली कावेरी का अब सपना है कि वो देश के लिए नेवी की तरफ से ही एशियन गेम्स में भाग लें और वहां भी देश को गोल्ड दिलाएं।
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खंडवा में पुनासा ब्लॉक के सिंगाजी गांव की रहने वाली एक युवती को जब इंडियन नेवी की सफेद वर्दी पहने देखते हैं तो हर कोई चौंक जाता है। दरअसल, ये दो भाई और सात बहनों सहित कुल 11 सदस्यीय परिवार की पांचवें नंबर की बेटी कावेरी हैं। कावेरी के पिता रणछोड़ दास इंदिरा सागर बांध के बैकवाटर में मछली पकड़कर अपने परिवार का गुजर बसर करते हैं। लेकिन इतने बड़े परिवार का खर्चा चलाना जब उनके लिए मुश्किल भरा हुआ तो उन्होंने घर के खर्चों की पूर्ति के लिए करीब 40 हजार रुपये का कर्ज ले लिया। उसके बाद कर्ज के साथ-साथ पिता के कंधों पर परिवार का बोझ देख उनकी पुत्री कावेरी ने इस कर्ज को पाटने के लिए पिता का हाथ बंटाने की ठानी। करीब नौ से 10 साल की छोटी उम्र में ही उन्होंने पिता के साथ-साथ अपने हाथ में भी नाव चलाने का चप्पू उठा लिया और नदी के गहरे पानी में निकल पड़ीं।
इस तरह हुई कावेरी की शुरुआत
घर से दूर इंदिरा सागर बांध के बेकवाटर में बेखौफ नाव चलाते हुए कावेरी पर एक दिन तत्कालीन स्पोर्ट्स ऑफिसर की नजर पड़ी, जिसके बाद उन्होंने कावेरी को कैनोइंग और कयाकिंग गेम्स में ट्रेनिंग लेने के लिए प्रेरित किया। इस दौरान कावेरी का नाव चलाते हुए एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसी वायरल वीडियो ने कावेरी की जिंदगी भी बदल दी। उन स्पोर्ट्स ऑफिसर ने कावेरी को कैनोइंग गेम्स में ट्रेनिंग लेने वाटर स्पोर्ट एकेडमी भोपाल में एडमिशन दिलवाया, जिसके बाद कावेरी ने अपने इसी हुनर को अपना जुनून बना लिया और एक के बाद एक कैनोइंग गेम्स में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर 45 से ज्यादा मेडल हासिल कर लिए।
45 गोल्ड, छह सिल्वर और तीन ब्रांज मेडल जीते
कावेरी ने एशियन गेम चाइना, वर्ल्ड चैंपियनशीप जर्मनी, एशियन चैंपियनशिप एंड ओलंपिक क्वॉलिफायर जापान, एशियन चैंपियनशिप उज्बेकिस्तान, यू-23 एशियन चैंपियनशिप थाईलैंड में भी हिस्सा लिया। उन्होंने नेशनल चैंपियनशिप में कुल 45 गोल्ड, छह सिल्वर और तीन ब्रांज मेडल जीते। इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें 11 लाख रुपये का इनाम भी दिया था। उसके बाद पिछले साल स्पोर्ट्स कोटे में उसका सिलेक्शन इंडियन नेवी में हो गया। यहां नेवी में सेलेक्ट होने के बाद कावेरी पहली बार वह अपने गांव पहुंची, जिस पर गांव वालों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
लड़की होने का गांव वालों ने कराया अहसास
बांध के बैकवाटर में नाव से नेवी तक के अपने सफर को तय करने वाली कावेरी को आम लोगों से कई तरह के ताने भी सुनना पड़े। लोग उन्हें परिवार की गरीबी और खुद के लड़की होने का एहसास भी कराते थे। ऐसे में कभी कभार तो कावेरी की हिम्मत भी टूटती रही, लेकिन फिर वो अपने आप को समेट कर पूरे जोश से लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ती जाती और आखिर में इसी का नतीजा रहा कि पिता के कर्ज के 40 हजार चुकाने के लिए नाव से मछलियों को पकड़ने निकली कावेरी अब उसी नाव से समुद्र की लहरों को चीरते हुए देश की सेवा भी करेंगी।
