झोले बतोले: डालडा के लड्डू!
भोपाल में नगरीय निकाय चुनावों की गहमागहमी परवान चढ़ने लगी है। इसी माहौल को हमारे मियां भोपाली अपने अनूठे अंदाज में पेश कर रिए हें-डालडा के लड्डू ! एक जमाने में भोपाल में डालडा का भी जलवा रेता था। इंदोर में तो खां जिला पिरशासन ने डालडा के लड्डू के चुनावी भाव तक ते कर दिए हें।
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को खां, इस बार नगर निगम चुनावों ने डालडा की यादें लपक ताजा कर दी हें। भोपाल नगर निगम चुनाव की मू्ल्य सूची अभी जारी नई हुई हेगी पर इंदोर जिला पिरशासन ने इस दफे डालडा के लड्डू की कीमत भी ते कर दी हे। मतलब ये के अगर कोई चुनाव पिरत्याशी वोटरों को डालडा के लड्डू बांटता पाया गया तो उत्ता पेसा पिरत्याशी के चुनाव खर्च में जुड़ जाएगा। कुल खर्च ज्यादा हुआ तो पिरत्याशी का चुनाव रद्द। वहां पिरशासन ने डालडा के एक लड्डू की कीमत ढाई सो रूपे किलो ते की हे। लड्डू अगर असली घी का हुआ तो ये कीमत दो गुनी यानी के पांच सो रू. किलो होगी। लुब्बो लुआब ये के खां, वोटरों को पटाने वास्ते लडडू बांटना भी खतरे से खाली नई हे।
मियां, इंदोर तो ठीक अपने भोपाल का डालडा से भोत करीब का रिश्ता रिया हेगा। वजह ये कि ये वो आइटम हे जिसे गरीब का घी समझ के लोग खाते रिए हें। डालडा की मकबूलियत का आलम ये रिया कि अगर किड़ींगकांग या जोर करने में कोई उन्नीसा मिला तो केते थे के खां डालडा खा के बड़ा हुआ हे क्या? गुजरे जमाने में असली घी हर किसी को नसीब नई था। लिहाजा कुआं खोद के पानी पीने वाले या तो तेल में खाना अोर पकवान बनाते थे या फिर डालडा में। डालडा को हिंदी में वनस्पति घी केते हें, मगर लोगों की जबान पे डालडा ई चढ़ा हुआ हे। डालडा केते ई लोग समझ जाते थे माल दो नंबर के घी में बना हे। डालडा इस मुल्क में अंगरेज लाए थे। ये तो तेल को इस कमाल से जमाने का कीमियागरी थी किे वो दिखता घी की माफिक ओर लज्जत में तेल में तेल पे भारी पड़ता था। शुरू में इसका नाम कासिम डाडा था। बाद में कंपनी ने अपने नाम का ‘एल’ हर्फ भी बीच में फंसा दिया तो नाम पड़ा डालडा। पीले रंग के डिब्बों पर हरे खजूर का पेड़ इसकी खास पेचान थी। गरीब की जेब के माफिक होने से जल्द ई जश्न जलसों में आइटम डालडा में बनने लगे। तिकड़मी भोपालियों ने तो इसका दूसरा इस्तेमाल खोज निकाला। डालडा के टीन के बड़े चोकोर डब्बों का इस्तेमाल पानी भरने के लिए होने लगा। पेले माल चरो फिर उसमें पानी भरो। आम के आम और गुठलियों के दाम। गरीबों और कम आमदनी वालों के रसोई घरों में डालडा के डब्बे अमूमन दिखाई पड़ते थे। हलुआ पूरी ओर तमाम मिठाइयां उसी में बनती थी ये सोचकर के मियां घी का तर माल खा रिए हें। भोपाल के सिन्धियों में तो पराठे खुसूसन डालडा में बनते थे।
मियां, वक्त वक्त की बात हे। जेसे भोपाल के पटिए उखड़े वेसे ई डालडा को रिफाइंड आॅइल की नजर लग गई। बाजार के आकाअोंने लोगों को समझाया के डालडा गला पकड़ता हे या फिर इससे इंसान मोटा होने लगता हे, लिहाजा रिफाइंड ऑइल खाओ। माहोल ऐसा बना के लोग धीरे धीरे मेंगा रिफाइंड तेल खाने लगे। डालडा के खजूर का पेड़ खुद गुमनामी के रेगिस्तान में गुम हो गया। मगर डालडा ने करीब चालीस सालो तक इस मुल्क पर जो राज करा, उसकी दूसरी मिसाल मुश्किल हे। डालडा तो हमारी जबान में भी शामिल हो गया। कहावत बनी के ‘दिल लगा डालडा से तो घी की क्या कदर?’
मियां डालडा की कदर ई कुछ एसी थी के लोग असली घी को अय्याशी का बाइस समझने लगे थे। मगर वक्त की मार समझो के डालडा का जुनून उतरा ओर उसे बनाने वाली कंपनी भी बिक गई। मगर अब डालडा फिर बाजार में प्लास्टिक पाउच में दिख रिया हे। कुछ लोग खरीदने भी लगे हें। इसे अमरीका की एक कंपनी बना रई हे ये सोच कर के डालडा के दिन फिरेंगे। इंदोर में डालडा के लड्डू की चुनावी अहमियत से इस बात को समझा जा सकता हे। यूं आजकल सोने से ले के आईडी तक नकली चल रई हे। कम से कम डालडा नकली तो नई हे। डालडा के लड्डू देसी घी का स्वाद भले न दें, मिठास तो पूरी घुला देते हें। को खां, ये भी कम बात नई हेगी।
- बतोलेबाज
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।