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मध्यप्रदेश चुनाव 2018: जयस का कितना होगा असर, क्या अंदरुनी लड़ाई डुबो देगी?
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 06 Nov 2018 01:54 PM IST
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मध्यप्रेदश में कितना असर करेगा जयस?
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मध्यप्रदेश में कुछ नए संगठनों का उदय इस बार की चुनावी लड़ाई को काफी दिलचस्प बना रहा है। ऐसे संगठन जो अपने दमखम और आकार में तो इतने बड़े नहीं हैं लेकिन कुछ सीटों पर बड़े राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल खड़ी करने का काम जरूर कर सकते हैं।
इन्हीं में से एक नाम है- जयस या कहें जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन। महज 5 साल पुराना लेकिन बीते दो साल में तमाम बड़े दलों को अपना नोटिस लेने पर मजबूर करने वाला संगठन।
वैसे भी सियासत में वक्त बदलते देर नहीं लगती। बीते कुछ समय में जयस की रैलियों में, जनसभाओं में उमड़ती भारी भीड़ इसका सबूत है।
जयस की स्थापना की एम्स में डॉक्टर रहे हीरालाल अलावा ने। वो देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में एसिस्टेंट प्रोफेसर थे। अच्छी नौकरी छोड़कर राजनीति की रपटीली राहों को अपनाने पर सवाल किए गए तो आदिवासियों के लिए काम करने की बात कही।
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अब पांच साल बाद डॉ. हीरालाल अलावा दिग्गजों से भरे सियासी मैदान में खम ठोकने को तैयार हैं। वो कांग्रेस के टिकट पर धार की मनावर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले हैं। अलावा धार के ही कुक्षी क्षेत्र से आते हैं।
उभार और तकरार
जयस सबसे पहले 2013 में चर्चा में आया जब उसने आलीराजपुर में अपनी तरह की पहली फेसबुक पंचायत का आयोजन किया। अगले ही साल 2014 में बरवानी में भी ऐसी ही पंचायत आयोजित की गई। मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी करीब 21 फीसदी है। धार, झाबुआ, आलीराजपुर जैसे जिलों में जयस ने ठीकठाक आधार बनाया है। इन जिलों से हटकर भी, जयस ने हाल में 20 आदिवासी बहुल जिलों में आदिवासी अधिकार यात्रा निकाली थी। जाहिर है इस यात्रा पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का ध्यान गया।
मालवा-निमाड़ क्षेत्र में जयस, कांग्रेस से 40 सीटें चाहती थी। बाद में ये आंकड़ा 23 और फिर कुछ और फिसकर 15 तक भी गया लेकिन बात बनी नहीं। ये अलग बात है कि भाजपा के मुकाबले देखा जाए तो जयस को साधने में कांग्रेस कुछ हद तक कामयाब दिखती है। सीटों के पेच का तो न कुछ होना था न हुआ लेकिन संगठन के मुखिया हीरालाल अलावा को धार से टिकट देकर पार्टी ने रणनीतिक तौर पर अहम कामयाबी तो हासिल कर ही ली।
जयस में 'नई लड़ाई'
लेकिन क्या सब कुछ इतना आसान है। जवाब न में है। जयस के भीतर भी हलचल तेज है। दरअसल, संगठन के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर काफी गुस्सा है कि डॉ. अलावा अपने लिए कांग्रेस से टिकट ले आए। कार्यकर्ताओं ने इसे विश्वासघात तक करार दिया। हालांकि, हीरालाल अलावा इस विरोध से ज्यादा परेशान नहीं दिखते।
उधर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी बाहरी उम्मीदवार को टिकट दिए जाने पर अलावा के पुतले फूंके। यानी, जयस के सामने भी न सिर्फ घर की दिक्कतों से जूझने की चुनौती है बल्कि बीते कुछ समय में खड़े हुए जनाधार को बनाए रखने की भी।
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इन्हीं में से एक नाम है- जयस या कहें जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन। महज 5 साल पुराना लेकिन बीते दो साल में तमाम बड़े दलों को अपना नोटिस लेने पर मजबूर करने वाला संगठन।
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वैसे भी सियासत में वक्त बदलते देर नहीं लगती। बीते कुछ समय में जयस की रैलियों में, जनसभाओं में उमड़ती भारी भीड़ इसका सबूत है।
जयस की स्थापना की एम्स में डॉक्टर रहे हीरालाल अलावा ने। वो देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल में एसिस्टेंट प्रोफेसर थे। अच्छी नौकरी छोड़कर राजनीति की रपटीली राहों को अपनाने पर सवाल किए गए तो आदिवासियों के लिए काम करने की बात कही।
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अब पांच साल बाद डॉ. हीरालाल अलावा दिग्गजों से भरे सियासी मैदान में खम ठोकने को तैयार हैं। वो कांग्रेस के टिकट पर धार की मनावर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले हैं। अलावा धार के ही कुक्षी क्षेत्र से आते हैं।
उभार और तकरार
जयस सबसे पहले 2013 में चर्चा में आया जब उसने आलीराजपुर में अपनी तरह की पहली फेसबुक पंचायत का आयोजन किया। अगले ही साल 2014 में बरवानी में भी ऐसी ही पंचायत आयोजित की गई। मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी करीब 21 फीसदी है। धार, झाबुआ, आलीराजपुर जैसे जिलों में जयस ने ठीकठाक आधार बनाया है। इन जिलों से हटकर भी, जयस ने हाल में 20 आदिवासी बहुल जिलों में आदिवासी अधिकार यात्रा निकाली थी। जाहिर है इस यात्रा पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का ध्यान गया।
मालवा-निमाड़ क्षेत्र में जयस, कांग्रेस से 40 सीटें चाहती थी। बाद में ये आंकड़ा 23 और फिर कुछ और फिसकर 15 तक भी गया लेकिन बात बनी नहीं। ये अलग बात है कि भाजपा के मुकाबले देखा जाए तो जयस को साधने में कांग्रेस कुछ हद तक कामयाब दिखती है। सीटों के पेच का तो न कुछ होना था न हुआ लेकिन संगठन के मुखिया हीरालाल अलावा को धार से टिकट देकर पार्टी ने रणनीतिक तौर पर अहम कामयाबी तो हासिल कर ही ली।
जयस में 'नई लड़ाई'
लेकिन क्या सब कुछ इतना आसान है। जवाब न में है। जयस के भीतर भी हलचल तेज है। दरअसल, संगठन के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर काफी गुस्सा है कि डॉ. अलावा अपने लिए कांग्रेस से टिकट ले आए। कार्यकर्ताओं ने इसे विश्वासघात तक करार दिया। हालांकि, हीरालाल अलावा इस विरोध से ज्यादा परेशान नहीं दिखते।
उधर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी बाहरी उम्मीदवार को टिकट दिए जाने पर अलावा के पुतले फूंके। यानी, जयस के सामने भी न सिर्फ घर की दिक्कतों से जूझने की चुनौती है बल्कि बीते कुछ समय में खड़े हुए जनाधार को बनाए रखने की भी।
