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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: चेक धारक भी बैंक का उपभोक्ता, भुगतान में देरी या अस्वीकृति पर कर सकता है शिकायत

Wed, 24 Jun 2026 08:00 AM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला,जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Wed, 24 Jun 2026 08:00 AM IST
सार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चेक का धारक भी बैंक का उपभोक्ता होता है और उसे बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायत करने का अधिकार है। जबलपुर में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने बैंक ऑफ इंडिया की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

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The holder of the cheque is also a customer of the bank
चेक का धारक भी बैंक का उपभोक्ता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चेक का धारक भी बैंक का उपभोक्ता माना जाएगा। यदि किसी चेक का भुगतान नहीं होता है या भुगतान में अनावश्यक देरी की जाती है, तो चेक प्राप्त करने वाले व्यक्ति को बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। केवल इस आधार पर शिकायत खारिज नहीं की जा सकती कि शिकायतकर्ता बैंक का प्रत्यक्ष ग्राहक नहीं है। हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए बैंक ऑफ इंडिया की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया।

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क्या था पूरा मामला

बैंक ऑफ इंडिया की ओर से दायर अपील में बताया गया कि उसकी एक शाखा में गिरधर डागा का "डागा कॉमर्स" नाम से पार्टनरशिप फर्म का खाता था। बाद में इस फर्म का पुनर्गठन कर उसे प्रोप्राइटरशिप फर्म में बदल दिया गया। इसके बाद पूर्व पार्टनरशिप फर्म के नाम से एक चेक जारी किया गया था। फर्म के नाम और खाते की स्थिति में बदलाव होने के कारण बैंक ने उस चेक का भुगतान करने से इनकार कर दिया और चेक को डिसऑनर कर दिया।

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बैंकिंग लोकपाल के पास पहुंचा मामला

चेक अस्वीकृत होने के बाद संबंधित पक्ष ने बैंकिंग लोकपाल योजना के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। मामले की सुनवाई के बाद आदेश की समीक्षा के लिए आवेदन भी प्रस्तुत किया गया। समीक्षा अधिकारी ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए बैंकिंग लोकपाल के पास भेज दिया।

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लोकपाल ने शिकायत खारिज की

बैंकिंग लोकपाल ने सुनवाई के दौरान माना कि बैंक की ओर से सेवा में कोई कमी नहीं थी। साथ ही यह भी कहा कि शिकायतकर्ता बैंक का ग्राहक नहीं है, इसलिए उसकी शिकायत स्वीकार नहीं की जा सकती। लोकपाल के इस आदेश को चुनौती देते हुए संबंधित पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

एकलपीठ ने दिया था शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकलपीठ ने शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया था। एकलपीठ के आदेश के खिलाफ बैंक ऑफ इंडिया ने युगलपीठ के समक्ष अपील दायर की थी।

सुनवाई में क्या पाया हाईकोर्ट ने

युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि बैंक ने केवल खाते के शीर्षक (अकाउंट टाइटल) में बदलाव के आधार पर चेक को दोषपूर्ण मानते हुए भुगतान से इनकार किया था। अदालत ने कहा कि बैंकिंग लोकपाल योजना के क्लॉज 12 और 13 के तहत यदि किसी चेक का भुगतान नहीं होता है या भुगतान में देरी होती है तो प्रभावित व्यक्ति को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है।

बैंक की सेवा में कमी मानी अदालत

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि खाते में बदलाव जरूर किया गया था, लेकिन खाता धारक की ओर से न तो चेक को रद्द किया गया था और न ही भुगतान रोकने (स्टॉप पेमेंट) के कोई निर्देश दिए गए थे। ऐसी स्थिति में बैंक द्वारा चेक अस्वीकार करना सेवा में कमी की श्रेणी में आता है।

चेक धारक भी है बैंक का उपभोक्ता

युगलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि चेक का धारक भी बैंक का उपभोक्ता है, क्योंकि बैंक अपने ग्राहक द्वारा जारी वैध चेक का सम्मान करने और उसका भुगतान करने के लिए बाध्य है। अदालत ने एकलपीठ के आदेश को सही ठहराते हुए बैंक ऑफ इंडिया की अपील खारिज कर दी और चेक धारक के अधिकारों को मान्यता दी।

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