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धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम: हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी राज्य सरकार, जल्द दायर करेगी एसएलपी
Fri, 18 Nov 2022 11:24 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Fri, 18 Nov 2022 11:24 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में धारा 10 के तहत अंतरजातीय विवाह के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन पेश करने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। इसके खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करेगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social Media
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विस्तार
धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 10 के तहत अंतरजातीय विवाह के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन पेश करने की अनिवार्यता को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने समाप्त कर दिया है। इसके खिलाफ अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करेगी।
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने बताया कि धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 1998 में भी अंतरजातीय विवाह करने के लिए जिला कलेक्टर के समक्ष आवेदन देने का प्रावधान था। संशोधित अधिनियम में पूर्व अनुसार उसे शामिल किया गया था। अंतरजातीय विवाह व धर्मांतरण प्रलोभन व दवाब में नहीं किया जाए, इसलिए यह नियम बनाया गया था। प्रशासन को इस संबंध में जानकारी होना चाहिए।
संशोधित कानून के खिलाफ को हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में धारा 10 के तहत अंतरजातीय विवाह के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन पेश करने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। इसके खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करेगी। हाईकोर्ट ने संविधान अनुच्छेद 21 में शादी की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है। संविधान में प्राप्त अधिकार सभी नागरिकों के लिए हैं, परंतु किसी व्यक्ति से दवाब व प्रलोभन देकर कार्य करवाना अवैधानिक है।
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महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने बताया कि धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 1998 में भी अंतरजातीय विवाह करने के लिए जिला कलेक्टर के समक्ष आवेदन देने का प्रावधान था। संशोधित अधिनियम में पूर्व अनुसार उसे शामिल किया गया था। अंतरजातीय विवाह व धर्मांतरण प्रलोभन व दवाब में नहीं किया जाए, इसलिए यह नियम बनाया गया था। प्रशासन को इस संबंध में जानकारी होना चाहिए।
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संशोधित कानून के खिलाफ को हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में धारा 10 के तहत अंतरजातीय विवाह के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन पेश करने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। इसके खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करेगी। हाईकोर्ट ने संविधान अनुच्छेद 21 में शादी की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है। संविधान में प्राप्त अधिकार सभी नागरिकों के लिए हैं, परंतु किसी व्यक्ति से दवाब व प्रलोभन देकर कार्य करवाना अवैधानिक है।
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