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Jabalpur News: वाहन जब्ती की कार्यवाही में उपस्थित हो सकेंगे अधिवक्ता, हाईकोर्ट का अहम फैसला
Thu, 13 Mar 2025 09:04 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Thu, 13 Mar 2025 09:04 PM IST
सार
MP High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ ने फैसला दिया कि अधिवक्ता जब्ती कार्यवाही में उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन शपथ-पत्र या कथनों पर जिरह नहीं कर सकते। वन विभाग द्वारा वाहन जब्ती पर याचिकाकर्ता को दस्तावेज प्राप्त करने व साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई, जबकि डीएफओ का आदेश निरस्त कर दिया गया।
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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ न्यायमूर्ति विशाल धगट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के तहत अधिवक्ताओं को जब्ती कार्यवाही में उपस्थित होने का अधिकार है। साथ ही, भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 52 के अंतर्गत अधिवक्ताओं की उपस्थिति पर कोई रोक नहीं है। हालांकि, वे प्रस्तुत कथन या शपथ-पत्र पर जिरह नहीं कर सकते।
बता दें कि टीकमगढ़ निवासी भगवान सिंह परमार की याचिका में कहा गया था कि वन विभाग ने उनका वाहन जब्त कर लिया था। जब्ती कार्यवाही के दौरान उन्होंने अधिवक्ता नियुक्त करने का आवेदन दिया, जिसे डीएफओ ने खारिज कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
ये भी पढ़ें- दुष्कर्म का आरोप गठित करने में होना चाहिए भौतिक तत्व, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी राहत
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याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्हें दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे वे जब्ती के खिलाफ उचित आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सके। उन्होंने दावा किया कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 52 के तहत अधिवक्ताओं की उपस्थिति पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
सरकार का पक्ष
सरकार ने पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब्ती कार्यवाही में साक्ष्य दर्ज नहीं किए जाते, इसलिए अधिवक्ताओं की उपस्थिति संभव नहीं है।
ये भी पढ़ें- जबलपुर में मुख्यमंत्री सम्मान कार्यक्रम की बसों में डीजल भरवाने पर जवाब तलब, कोर्ट हलफनामे से नाखुश
हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के अनुसार अधिवक्ताओं को किसी भी न्यायाधिकरण या कानूनी रूप से साक्ष्य लेने के लिए अधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार है। वन विभाग जब्ती कार्यवाही में वाहन मालिक से साक्ष्य लेता है, जिससे यह प्रक्रिया न्यायिक प्रकृति की मानी जाएगी। अधिवक्ता जब्ती कार्यवाही में उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत कथन या शपथ-पत्र पर जिरह करने का अधिकार नहीं होगा। डीएफओ द्वारा 15 जनवरी 2025 को पारित आदेश को निरस्त किया जाता है। याचिकाकर्ता को वन रेंजर, निवाड़ी के कार्यालय से दस्तावेज प्राप्त करने और अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
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बता दें कि टीकमगढ़ निवासी भगवान सिंह परमार की याचिका में कहा गया था कि वन विभाग ने उनका वाहन जब्त कर लिया था। जब्ती कार्यवाही के दौरान उन्होंने अधिवक्ता नियुक्त करने का आवेदन दिया, जिसे डीएफओ ने खारिज कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
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याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्हें दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे वे जब्ती के खिलाफ उचित आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सके। उन्होंने दावा किया कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 52 के तहत अधिवक्ताओं की उपस्थिति पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
सरकार का पक्ष
सरकार ने पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब्ती कार्यवाही में साक्ष्य दर्ज नहीं किए जाते, इसलिए अधिवक्ताओं की उपस्थिति संभव नहीं है।
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हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के अनुसार अधिवक्ताओं को किसी भी न्यायाधिकरण या कानूनी रूप से साक्ष्य लेने के लिए अधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार है। वन विभाग जब्ती कार्यवाही में वाहन मालिक से साक्ष्य लेता है, जिससे यह प्रक्रिया न्यायिक प्रकृति की मानी जाएगी। अधिवक्ता जब्ती कार्यवाही में उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत कथन या शपथ-पत्र पर जिरह करने का अधिकार नहीं होगा। डीएफओ द्वारा 15 जनवरी 2025 को पारित आदेश को निरस्त किया जाता है। याचिकाकर्ता को वन रेंजर, निवाड़ी के कार्यालय से दस्तावेज प्राप्त करने और अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
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