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जबलपुर: अतिथि शिक्षक बना फर्जी वकील, जेल से तीन सौ से ज्यादा वकालतनामे लिए; हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश
Wed, 02 Sep 2026 07:39 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Wed, 02 Sep 2026 07:39 PM IST
सार
जबलपुर हाईकोर्ट ने अतिथि शिक्षक नीरज कुमार साकेत द्वारा अधिवक्ता बनकर जेलों से 300 से अधिक वकालतनामे लेने के मामले में जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया गंभीर अनियमितता माना। स्कूल शिक्षा विभाग, जेल प्रशासन और स्टेट बार काउंसिल को 30 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।
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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने शासकीय विद्यालय में पदस्थ अतिथि शिक्षक के अधिवक्ता बनकर जेलों से 300 से ज्यादा वकालतनामे लेने के गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की पीठ ने इस प्रकरण को दलाली और अदालत के समक्ष असत्य कथन का मामला माना है। पीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग, रीवा केंद्रीय जेल प्रशासन और मध्य प्रदेश स्टेट बार काउंसिल को पृथक-पृथक जांच कर 30 दिन में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
फर्जीवाड़ा और गलत शपथपत्र
मामले की सुनवाई के दौरान रीवा जिले के सिरमौर थाना तहत शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बरेला में पदस्थ वर्ग-दो के अंग्रेजी अतिथि शिक्षक नीरज कुमार साकेत की पोल खुली। उच्च न्यायालय में दायर एक मामले में अधिवक्ता राम प्रकाश यादव ने शपथपत्र दाखिल किया था। अधिवक्ता ने अपने शपथपत्र के दो पैराग्राफ में नीरज कुमार साकेत को अधिवक्ता बताया था। पीठ ने जांच के बाद पाया कि यह कथन प्रथम दृष्टया झूठा है और अदालत को गुमराह करने का प्रयास है। सुनवाई के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल जबलपुर के वरिष्ठ अधीक्षक अखिलेश सिंह तोमर ने अदालत में उपस्थित होकर जानकारी दी कि वकालतनामा जारी करने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया लागू है और संबंधित व्यक्ति वास्तव में शासकीय स्कूल में गेस्ट लेक्चरर के पद पर कार्यरत है।
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वकील का दलाल बना हुआ था
अदालत में पेश विवरण के अनुसार नीरज साकेत ने विभिन्न जेल अधिकारियों से अधिवक्ता राम प्रकाश यादव के नाम पर 30 वकालतनामे प्राप्त किए थे। इनमें से केवल एक आरोपी राजेंद्र साकेत से रिश्तेदारी के आधार पर उसका वकालतनामा लेने का औचित्य बन सकता था, जबकि अन्य 29 आरोपियों के वकालतनामे प्राप्त करने का उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं था। इसके अतिरिक्त रीवा केंद्रीय जेल से उक्त अधिवक्ता के लिए 300 से अधिक वकालतनामे प्राप्त किए जाने की जानकारी सामने आई। अदालत ने माना कि नीरज साकेत अधिवक्ता का 'दलाल' बनकर जेल से वकालतनामों का प्रबंध कर रहा था, जिन्हें अधिवक्ता अपनी सुविधा के अनुसार अदालत में दाखिल कर रहे थे।
तीन निकायों को जांच के आदेश
उच्च न्यायालय ने पूरे तंत्र पर नाराजगी जताते हुए तीन संबंधित विभागों को जांच सौंपी है। पीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग को शिक्षक नीरज साकेत के आचरण और उसकी भूमिका की पड़ताल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने जिला शिक्षा अधिकारी रीवा को आदेश की प्रति भेजने और लोक शिक्षण आयुक्त को इसकी जानकारी देने को कहा है। पीठ ने जेल एवं सुधार प्रशासन के महानिदेशक को रीवा केंद्रीय जेल के तत्कालीन अधीक्षक के विरुद्ध जांच के निर्देश दिए हैं कि उन्होंने आरोपियों और वकालतनामा प्राप्तकर्ता के बीच संबंधों का सत्यापन किए बिना दस्तावेज़ कैसे प्रमाणित किए। स्टेट बार काउंसिल को अधिवक्ता के खिलाफ झूठा शपथपत्र दाखिल करने और दलाली के आरोपों पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने प्रकरण की जानकारी महाधिवक्ता को भी भेजने के आदेश दिए हैं।
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फर्जीवाड़ा और गलत शपथपत्र
मामले की सुनवाई के दौरान रीवा जिले के सिरमौर थाना तहत शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बरेला में पदस्थ वर्ग-दो के अंग्रेजी अतिथि शिक्षक नीरज कुमार साकेत की पोल खुली। उच्च न्यायालय में दायर एक मामले में अधिवक्ता राम प्रकाश यादव ने शपथपत्र दाखिल किया था। अधिवक्ता ने अपने शपथपत्र के दो पैराग्राफ में नीरज कुमार साकेत को अधिवक्ता बताया था। पीठ ने जांच के बाद पाया कि यह कथन प्रथम दृष्टया झूठा है और अदालत को गुमराह करने का प्रयास है। सुनवाई के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल जबलपुर के वरिष्ठ अधीक्षक अखिलेश सिंह तोमर ने अदालत में उपस्थित होकर जानकारी दी कि वकालतनामा जारी करने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया लागू है और संबंधित व्यक्ति वास्तव में शासकीय स्कूल में गेस्ट लेक्चरर के पद पर कार्यरत है।
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वकील का दलाल बना हुआ था
अदालत में पेश विवरण के अनुसार नीरज साकेत ने विभिन्न जेल अधिकारियों से अधिवक्ता राम प्रकाश यादव के नाम पर 30 वकालतनामे प्राप्त किए थे। इनमें से केवल एक आरोपी राजेंद्र साकेत से रिश्तेदारी के आधार पर उसका वकालतनामा लेने का औचित्य बन सकता था, जबकि अन्य 29 आरोपियों के वकालतनामे प्राप्त करने का उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं था। इसके अतिरिक्त रीवा केंद्रीय जेल से उक्त अधिवक्ता के लिए 300 से अधिक वकालतनामे प्राप्त किए जाने की जानकारी सामने आई। अदालत ने माना कि नीरज साकेत अधिवक्ता का 'दलाल' बनकर जेल से वकालतनामों का प्रबंध कर रहा था, जिन्हें अधिवक्ता अपनी सुविधा के अनुसार अदालत में दाखिल कर रहे थे।
तीन निकायों को जांच के आदेश
उच्च न्यायालय ने पूरे तंत्र पर नाराजगी जताते हुए तीन संबंधित विभागों को जांच सौंपी है। पीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग को शिक्षक नीरज साकेत के आचरण और उसकी भूमिका की पड़ताल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने जिला शिक्षा अधिकारी रीवा को आदेश की प्रति भेजने और लोक शिक्षण आयुक्त को इसकी जानकारी देने को कहा है। पीठ ने जेल एवं सुधार प्रशासन के महानिदेशक को रीवा केंद्रीय जेल के तत्कालीन अधीक्षक के विरुद्ध जांच के निर्देश दिए हैं कि उन्होंने आरोपियों और वकालतनामा प्राप्तकर्ता के बीच संबंधों का सत्यापन किए बिना दस्तावेज़ कैसे प्रमाणित किए। स्टेट बार काउंसिल को अधिवक्ता के खिलाफ झूठा शपथपत्र दाखिल करने और दलाली के आरोपों पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने प्रकरण की जानकारी महाधिवक्ता को भी भेजने के आदेश दिए हैं।
